सुप्रीम कोर्ट का फैसला: हाईकोर्ट पर नाराज़गी, भ्रष्टाचार केस में आरोपी को मिली अग्रिम ज़मानत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे एक आरोपी को अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) प्रदान करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की कड़ी आलोचना की है।
अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका पर निर्णय लेने के बजाय पुलिस से यह पूछना शुरू कर दिया कि चार साल तक उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट को या तो जमानत मंजूर करनी चाहिए थी या फिर इसे खारिज कर देना चाहिए था, लेकिन इस तरह का अस्पष्ट और असामान्य आदेश उचित नहीं था।
यह मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 7A तथा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120B के तहत दर्ज FIR से जुड़ा है। आरोपी ने गिरफ्तारी से सुरक्षा की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने इस पर निर्णय लेने के बजाय पंजाब पुलिस के डीजीपी से हलफ़नामा मांगा कि चार्जशीट दाखिल क्यों नहीं की गई और अब तक आरोपी की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई। आरोपी ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि जब FIR 2021 में दर्ज हुई थी तो आरोपी ने 2025 में ही अग्रिम जमानत क्यों मांगी।
इस पर आरोपी ने कहा कि पहले उसे लगा कि उसके खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं है, क्योंकि उसका निलंबन रद्द कर 27 सितंबर 2023 को सेवा में बहाल कर दिया गया था। लेकिन आर्थिक अपराध शाखा से पेशी का नोटिस आने के बाद उसे गिरफ्तारी का डर हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जब चार साल तक आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया तो यह अपने आप में जमानत देने का पर्याप्त आधार है।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि सह-आरोपी, जिस पर रिश्वत लेने का सीधा आरोप था, उसे पहले ही अग्रिम ज़मानत मिल चुकी है। इस स्थिति में आरोपी के पक्ष में लंबा समय गिरफ्तारी न होना एक महत्वपूर्ण तथ्य है।
आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि आरोपी को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे जांच अधिकारी द्वारा तय की जाने वाली शर्तों के साथ जमानत पर रिहा किया जाए।
साथ ही अदालत ने साफ कर दिया कि हाईकोर्ट का रुख न केवल ग़लत बल्कि अनुचित भी था।











