मिडल ईस्ट तनाव का असर दवा उद्योग पर, कच्चे माल महंगे होने से दवाइयों के दाम बढ़ने की आशंका

मध्यपूर्व में जारी युद्ध जैसी परिस्थितियों का असर अब दवा उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। बढ़ती उत्पादन लागत के कारण दवा कंपनियों ने सरकार से दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी की अनुमति देने की मांग की है। उद्योग का कहना है कि कच्चे माल और परिवहन खर्च में तेजी से बढ़ोतरी के कारण दवाओं का उत्पादन महंगा होता जा रहा है।
दवा निर्माताओं के अनुसार दवाओं की कीमतें वर्तमान में राष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल मूल्य निर्धारण प्राधिकरण के नियंत्रण में हैं, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए मूल्य नियंत्रण में कुछ राहत देने की जरूरत है। साथ ही दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के आयात-निर्यात पर सब्सिडी देने की भी मांग की गई है।
उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और परिवहन लागत बढ़ने से दवा निर्माण पर सीधा असर पड़ा है। पेट्रोकेमिकल्स से बनने वाले कई सॉल्वेंट्स दवा निर्माण में उपयोग होते हैं और इनके दाम हाल के दिनों में काफी बढ़ गए हैं। कुछ कच्चे माल की कीमतों में 60 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि ग्लिसरीन की कीमत में दिसंबर से अब तक करीब 64 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं पैरासिटामोल की कीमत लगभग 26 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय शिपिंग में देरी, कंटेनरों की कमी और बढ़े हुए फ्रेट चार्ज भी दवा उद्योग की लागत बढ़ा रहे हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अधिकतर कंपनियां जस्ट-इन-टाइम इन्वेंटरी सिस्टम पर काम करती हैं, जिसके कारण दवाओं का बहुत अधिक स्टॉक नहीं रखा जाता। ऐसे में यदि यह स्थिति 10 से 15 दिन तक और बनी रहती है तो जरूरी दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
फार्मा उद्योग का यह भी कहना है कि कई मध्यपूर्वी देश सस्ती दवाओं के लिए भारत पर निर्भर हैं, इसलिए इस स्थिति का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है। कच्चे माल, पैकेजिंग सामग्री और एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स की कीमतों में बढ़ोतरी से उत्पादन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उद्योग ने सरकार से मांग की है कि एमएसएमई श्रेणी के फार्मा निर्यातकों को बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत को संतुलित करने के लिए परिवहन सब्सिडी देने पर भी विचार किया जाए।











