जब अमीर ओढ़े गरीबी का चोला: धमतरी में बीपीएल के नाम पर बड़ा खेल बेनकाब

धमतरी : क्या कोई किसान, जिसकी खेतिहर ज़मीन 30 एकड़ तक फैली हो, सचमुच ‘गरीब’ हो सकता है. यह सवाल अब धमतरी जिले की गलियों से लेकर प्रशासनिक दफ्तरों तक गूंज रहा है. वजह है एक ऐसा खुलासा, जिसने व्यवस्था के चेहरे पर चढ़े ‘पात्रता’ के मुखौटे को झटके में उतार दिया.

डेटा ने खोली परतें, मंडी से राशन तक का दोहरा खेल उजागर

खरीफ वर्ष 2025-26 के धान खरीदी डेटा जैसे ही सॉफ्टवेयर में दर्ज हुआ, आंकड़ों की परतों के भीतर छिपी सच्चाई सामने आने लगी. वे चेहरे, जो मंडियों में हजारों क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर बेचते हैं, वही राशन दुकानों की कतार में ‘गरीबी’ का प्रमाण लेकर खड़े पाए गए. जांच में 5 से 30 एकड़ जमीन वाले 756 किसान बीपीएल सूची में दर्ज मिले—मानो समृद्धि और अभाव ने एक ही घर में अजीब-सा गठबंधन कर लिया हो.

केंद्र की सूची से हड़कंप, आय और पद ने बढ़ाए सवाल

कहानी यहीं खत्म नहीं होती. केंद्र से आई 85 हजार संदिग्धों की सूची ने इस खेल को और गहरा कर दिया. जिले के 1569 लोग, जिनकी आय 6 से 25 लाख रुपये के बीच है, अब भी गरीबों के हिस्से का अनाज ले रहे थे. इनमें 123 ‘डायरेक्टर’ स्तर के चेहरे भी शामिल हैं—यानी सत्ता, संसाधन और सुविधा—तीनों एक ही कतार में खड़े नजर आए.

ब्लॉकवार तस्वीर: हर कोने में ‘रसूखदार गरीब’

ब्लॉकवार आंकड़े इस ‘सुविधा-तंत्र’ की जड़ें और गहरी दिखाते हैं. धमतरी में 46 डायरेक्टर और 665 उच्च आय वर्ग, कुरुद में 37 और 517, मगरलोड में 21 व 115 तथा नगरी में 19 व 272 ऐसे मामले सामने आए हैं, जो व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं.

प्रशासन का शिकंजा और तय डेडलाइन

अब प्रशासन ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. 50 से अधिक कार्ड निरस्त हो चुके हैं, और जिनकी आय 7 लाख से अधिक है, वे सूची से बाहर किए जा रहे हैं. नियम साफ हैं—सामान्य क्षेत्रों में 5 एकड़ और अनुसूचित क्षेत्रों में 10 एकड़ से अधिक जमीन वालों के लिए बीपीएल का दरवाजा बंद है.

जुलाई से छिन सकती है ‘मुफ्त थाली’, तकनीकी अड़चनें बरकरार

फिलहाल अपात्रों को अप्रैल से जून तक का समय दिया गया है, लेकिन जुलाई 2026 से राशन की यह ‘मुफ्त थाली’ छिनने वाली है.राशन दुकानों में सॉफ्टवेयर अपडेट के बाद वितरण शुरू हो चुका है, जहां लगभग 90% हितग्राही लाभ ले चुके हैं, जबकि शेष सर्वर की सुस्ती के कारण अब भी कतार में हैं.

यह कहानी सिर्फ राशन की नहीं, बल्कि उस सोच की है—जहां ‘हक’ और ‘हड़पने’ के बीच की रेखा धीरे-धीरे मिटती चली गई. अब देखना यह है कि यह कार्रवाई बदलाव की शुरुआत बनती है या सिर्फ एक और खबर बनकर रह जाती है.

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