क्या डीएम खुद के नाम पर ले सकता है गन लाइसेंस? बिहार में बवाल के बीच जानिए नियम-कानून

बिहार विधान परिषद में पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को शस्त्र लाइसेंस नहीं मिलने का एमएलसी संतोष कुमार ने मामला उठाया गया. इस दौरान उन्होंने यह भी जानकारी दी कि कैमूर के पूर्व जिलाधिकारी सुनील कुमार द्वारा अपने कार्यकाल 2 जून 2025 से लेकर दिसंबर 2025 तक में अपनी सुरक्षा के लिए खुद ही हथियार का लाइसेंस इश्यू कर लिया गया था. इस मामले को लेकर एमएलसी संतोष कुमार सिंह ने कहा कि यह देश में अपनी तरह पहला मामला है. सदन के अन्य सदस्यों ने भी कैमूर के पूर्व जिलाधिकारी सुनील कुमार इस हरकत की आलोचना करते हुए उनके लाइसेंस को निरस्त करने की मांग की.

क्या जिलाधिकारी खुद को लाइसेंस जारी कर सकता है?

क्या कोई जिलाधिकारी खुद को शस्त्र लाइसेंस जारी कर सकता है, इसे समझने के लिए आपको ऑर्म्स एक्ट 1959, आर्म्स रुल्स 2016 और प्रशासनिक कानून पर गौर करना होगा. दरअसल, इन सभी कानून में कोई भी ऐसा स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो किसी डीएम को अपने ही शस्त्र लाइसेंस के आवेदन पर खुद फैसला लेने या फिर ना लेने की अनुमति देता हो. हालांकि, अगर अगर जिलाधिकारी ने खुद को शस्त्र लाइसेंस दे दिया है, तो यह हितों के टकराव का मामला बन सकता है. साथ ही आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठता है.ऐसे मामलों में एक प्रशासनिक सिद्धांत Nemo judex in causa sua ((कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता) जरूर लागू किया जा सकता है. आदर्श स्थिति यह होती है कि नैतिकता के आधार पर जिलाधिकारी को अपनी शस्त्र लाइसेंस कि किसी अन्य उच्च अधिकारी या राज्य को भेजनी चाहिए थे. हालांकि, ऐसा कोई नियम नहीं है, लेकिन संबंधित जिलाधिकारी द्वारा यह किया जा सकता है.

ऐसे मामलों में कब उठते हैं जिलाधिकारी पर गंभीर सवाल?

आर्म्स एक्ट 1959 की धारा 13 के अनुसार हथियार लाइसेंस, लाइसेंसिंग अथॉरिटी जारी करती है. आर्म्स रुल्स 2016 के तहत अधिकांश मामलों में जिले की लाइसेंसिंग अथॉरिटी जिलाधिकारी होती हैं. यही कारण है कि यदि आवेदक खुद डीएम हो, तो हितों के टकराव का सवाल सामने आता है. लेकिन अगर जिलाधिकारी ने ऐसा किया भी है तो उस पर कोई कार्रवाई का नियम नहीं है. हालांकि, अगर लाइसेंस जारी के दौरान पुलिस सत्यापन, आपराधिक रिकॉर्ड की जांच, आवेदक की पात्रता, सुरक्षा संबंधी आकलन को दरकिनार किया गया हो, तो उस पर सवाल उठ सकते हैं.

भारतीय प्रशासनिक कानून और न्यायालयों के स्थापित सिद्धांत भी कहते हैं-

  • कोई अधिकारी अपने निजी हित वाले मामले में स्वयं निर्णय नहीं ले.
  • निर्णय निष्पक्ष होने के साथ-साथ निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए .
  • इसी आधार पर ऐसे मामलों में निर्णय प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं.

गन लाइसेंस किसे दिया जाता है?

गन लाइसेंस उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसके जीवन को वास्तविक खतरा हो, आत्मरक्षा की जरूरत साबित हो, फसल या संपत्ति की सुरक्षा के लिए जरूरत हो, शूटिंग जैसे खेलों के लिए आवश्यकता हो, जंगली जानवरों से सुरक्षा चाहिए या फिर व्यावसायिक आवश्यकता के लिए जारी किया जाता है.

गन लाइसेंस कैसे मिलता है?

  • जिला लाइसेंसिंग प्राधिकारी के पास आवेदन करना होता है
  • फिर पुलिस वेरिफिकेशन होता है.
  • आवेदक का आपराधिक रिकॉर्ड, चरित्र और पृष्ठभूमि की जांच होती है.
  • खतरे या आवश्यकता का मूल्यांकन किया जाता है.
  • फिर जाकर लाइसेंस जारी किया जाता है या फिर मना कर दिया जाता है.
  • यदि आवेदन खारिज होता है, तो अपील का भी प्रावधान है.
  • केवल यह कहना कि मुझे सुरक्षा चाहिए काफी नहीं होता.
  • पुलिस सत्यापन और अन्य तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाता है.

क्या जिलाधिकारी पर हो सकती है कार्रवाई

साफ अर्थ यह हुआ कि जिलाधिकारी भी एक नागरिक के तौर पर गन लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकता है. उसे भी आर्म्स और आर्म्स की प्रक्रिया से गुजरना होगा. किसी तरह की कोई छूट नहीं मिलती है. यदि उसने अपने ही आवेदन पर खुद को लाइसेंस दे दिया है, तो यह उसके प्रशासनिक शुचिता पर सवाल उठाता है. गंभीर जांच और कानूनी बहस का मुद्दा बन सकता है.हालांकि, कार्रवाई की संभावना तब है जब यह स्थापित हो कि डीएम ने नियमों का उल्लंघन किया है.अपने पद का दुरुपयोग किया, प्रशासनिक आचरण का उल्लंघन, निजी लाभ लिया हो या निर्णय लेने की प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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