न बातचीत, न इमोशन, एक ही घर में सब अनजान…रील्स देखने की लत से रिश्तों को कितना नुकसान

रील्स की लत…. आज ये अमूमन भारत के हर घर की समस्या बन गई है. सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक, किसी भी टाइम लोग कई घंटे रील्स देखने में लगे रहते हैं. ये हमें मेंटली तो कमजोर बना रही है पर ये कैसे रिश्तों में दूरी ला रही है, ये बहुत कम समझ पा रहे हैं. एक इंसान जब रील्स देखने लगता है तो वो अपनी ही दुनिया में खो जाता है. एनसीबीआई की रिपोर्ट कहती है कि रील्स की लत से दिमाग और शरीर दोनों पर बुरा असर पड़ता है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों की रोशनी कमजोर, फिजिकली फिट न होने से मोटापा और डायबिटीज जैसी बीमारियां हो सकती हैं.
इन सब में एक बड़ा खतरा रिश्ते को खोना या इनमें आने वाली दूरी है. एक ही घर में अनजानों की तरह रहना, न बातचीत और न ही इमोशन्स होना… ऐसी कई दिक्कतें हैं जो लोगों को अपनों से अलग कर रही हैं. चलिए आपको एक्सपर्ट के जरिए बताते हैं…
रील्स का नशा क्यों लगता है?
कई रिसर्च में सामने आया है कि हर कुछ सेकंड में नए वीडियो से दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है. इस कंडीशन को Variable Reward System पुकारा जाता है. दरअसल, एक वीडियो के बाद दूसरी वीडियो में और भी मजेदार कंटेंट मिलेगा ये दिमाग में उम्मीद बनी रहती है. इसलिए लोग 10 मिनट की रील्स के टाइम में एक या दो घंटे तक बिता देता है. ये ही रील्स का नशा है.
हर रील में नयापन बनता है मुसीबत
डॉ. पंकज कुमार (प्रिंसिपल कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट, मैक्स हॉस्पिटल) कहते हैं कि रील्स हमारे जीवन में बहुत कॉमन हो गई है. किसी भी उम्र का इंसान रील्स को देखते हैं. एक्सपर्ट कहते हैं कि रील्स की लत जब पड़ जाती है तो इसका नुकसान हमारे रिश्तों को होता है. कुछ सेकंड में नया कंटेंट और तुरंत मिलने वाला डोपामाइन रिवॉर्ड देती है. ऐसे में हमारा दिमाग उतनी तेजी का आदी हो जाता है और इसी तरह रिश्तों में भी व्यवहार आने लगता है. बाद में परिवार के लोगों की बात उतनी रोचक नहीं लगती.
क्या होती है Phubbing?
रील्स की तरह रियल लाइफ इतनी फास्ट नहीं होती. रील्स में हर 30 सेकंड में नयापन आता है लेकिन रियल लाइफ में ऐसा संभव नहीं है. इसलिए असल जिंदगी हमें बोरिंग लगने लगती है. इस तरह की कंडीशन से रिश्तों में Phubbing बढ़ती है. इसका मतलब है कि सामने बैठे व्यक्ति को नजरअंदाज कर मोबाइल चलाना.
इमोशनल दूरी होना
आज कई घरों में लोग एक ही कमरे में फिजिकली बैठे तो होते हैं लेकिन उनके हाथों में मौजूद मोबाइल ही उनकी असली दुनिया होता है. एक्सपर्ट कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा नुकसान है कि साथ होते हुए भी भावनात्मक दूरी बढ़ जाती है. संवाद कम हो जाता है और इससे गलतफहमियां बढ़ जाती हैं.
अकेलेपन की शुरुआत होना
इतना ही नहीं कंडीशन अकेलेपन तक पहुंच जाती है. दिमाग में ख्याल आने लगते हैं कि मुझे कोई समझता नहीं है, मेरी कोई वैल्यू नहीं है. दरअसल, रील्स हमें उसी तरह का कंटेंट दिखाता है जिसकी हम ख्वाहिश रखते हैं. ऐसे में मन के अंदर उम्मीदें बढ़ जाती हैं और लोग अपनों से भी उम्मीदें बांधने लगते हैं. ऐसे में उनसे मनमुटाव होता है और इंसान अकेलेपन में अपनी ही दुनिया बनाने लगता है.
खतरे की घंटी तब बजती है जब इंसान हर सिचुएशन जैसे खाते समय, सोते समय, बातचीत के बीच और परिवार के साथ बिताया हुआ समय उसे बोर लगने लगे. अपनों को ही टॉक्सिक फील करने के हालात बनने लगते हैं.
इसका सॉल्यूशन है डिजिटल डिटॉक्स
- एक्सपर्ट कहते हैं कि इसका सॉल्यूशन डिजिटल डिटॉक्स है. आपको पूरी तरह फोन को छोड़ना नहीं है बस इसे यूज करने की लिमिट तय करनी है.
- घर में नो फोन टाइम तय कर सकते हैं. जैसे खाना खाते वक्त फोन को बिल्कुल नहीं छूना है.
- सोने से अक्सर दो घंटे पहले फोन को नहीं छूना है क्योंकि इसकी ब्लू लाइट हमारी मेंटल हेल्थ को नुकसान पहुंचाती है.
- परिवार के साथ कम से कम आधा घंटा जरूर बिताएं.











