कभी कोसी थी ‘अभिशाप’, अब बनेगी वरदान! पूर्णिया समेत 4 जिलों के 2.14 लाख हेक्टेयर खेतों को मिलेगा पानी

सीमांचल के किसानों के लिए बड़ी और उम्मीद जगाने वाली खबर है. यहां जिस कोसी नदी का नाम सुनते ही कभी बाढ़, कटाव और बर्बाद होती फसलों की तस्वीर सामने आती थी, अब उसी कोसी के अधिशेष पानी का इस्तेमाल किसानों के खेतों की सिंचाई के लिए करने की तैयारी है. कोसी-मेची अंतरराज्यीय रिवर लिंक परियोजना के जरिए कोसी के अतिरिक्त पानी को नियंत्रित तरीके से मेची नदी तक पहुंचाने के साथ सीमांचल के बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचाई सुविधा देने की योजना है.
वर्षों से कोसी की बाढ़ सीमांचल के किसानों के लिए बड़ी चुनौती रही है. सैकड़ों एकड़ खेत जलमग्न हो जाते थे, फसलें बर्बाद होती थीं और कई जगह कटाव के कारण उपजाऊ जमीन तक नदी में समा जाती थी. अब सरकार की कोशिश है कि जिस पानी से कभी तबाही होती थी, उसे नियंत्रित कर खेती और किसानों की खुशहाली का आधार बनाया जाए.
6,282.32 करोड़ रुपये की परियोजना
करीब 6,282.32 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना को मार्च 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बुधवार को सुपौल जिले के छातापुर प्रखंड स्थित चैनपुर गांव पहुंचकर निर्माणाधीन परियोजना का निरीक्षण किया और अधिकारियों को कार्य में तेजी लाने के साथ गुणवत्ता और समयसीमा का विशेष ध्यान रखने का निर्देश दिया.
2.14 लाख हेक्टेयर खेतों तक पहुंचेगा पानी
परियोजना पूरी होने के बाद 2,14,813 हेक्टेयर कृषि भूमि को अतिरिक्त और सुनिश्चित सिंचाई सुविधा मिलने की बात कही गई है. इसका सबसे बड़ा लाभ सीमांचल के चार जिलों—पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और कटिहार—के किसानों को मिलेगा. पूर्णिया में 69,970 हेक्टेयर, अररिया में 69,642, किशनगंज में 39,548 और कटिहार में 35,653 हेक्टेयर खेतों तक पानी पहुंचेगा.
यानी सीमांचल के लाखों किसानों के खेतों तक सिंचाई का दायरा बढ़ने की उम्मीद है. इससे बारिश पर निर्भरता कम हो सकती है और पर्याप्त पानी मिलने पर एक से अधिक फसल की संभावनाएं भी बढ़ेंगी. परियोजना के तहत पूर्वी कोसी मुख्य नहर की जल संवहन क्षमता 15 हजार क्यूसेक्स से बढ़ाकर 20 हजार क्यूसेक्स की जाएगी. इसके अलावा चार शाखा नहरों, छह वितरणियों और अन्य आवश्यक नहर प्रणालियों का निर्माण किया जाएगा. परियोजना के अंतिम छोर पर करीब 950 क्यूसेक्स पानी मेची नदी में प्रवाहित किया जाएगा. इस व्यवस्था से कोसी के अधिशेष पानी का बेहतर इस्तेमाल करने और महानंदा बेसिन में पानी की उपलब्धता बढ़ाने की योजना है.
बाढ़ का पानी अब बनेगा किसानों की ताकत
कोसी की बाढ़ ने लंबे समय तक किसानों की मेहनत को नुकसान पहुंचाया है. खेतों में पानी भरने से फसलें बर्बाद होती थीं और कटाव से जमीन का नुकसान अलग. अब इसी अधिशेष पानी को नियंत्रित कर सिंचाई के उपयोग में लाने की योजना किसानों के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकती है. सरकार का फोकस अब सिर्फ बाढ़ से बचाव तक सीमित नहीं है, बल्कि बाढ़ के पानी का उपयोग सिंचाई और कृषि विकास के लिए करने पर भी है.
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि निर्माण कार्य के दौरान किसानों को कृषि कार्य में किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए. साथ ही परियोजना की लगातार निगरानी, निर्माण की गुणवत्ता और समयबद्धता सुनिश्चित करने को कहा गया है. सिंचाई सुविधा का विस्तार होने से कृषि उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है. किसानों को समय पर पानी मिलने पर खेती का रकबा बढ़ सकता है और फसल चक्र में भी बदलाव संभव है. इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
कोसी-गंडक को व्यवस्थित करने की भी तैयारी
यही वजह है कि कोसी-मेची परियोजना को सिर्फ एक नहर परियोजना के तौर पर नहीं, बल्कि कोसी सीमांचल में जल प्रबंधन और कृषि विकास की बड़ी योजना के रूप में देखा जा रहा है. समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने कोसी और गंडक नदियों को व्यवस्थित एवं सुव्यवस्थित करने के लिए समग्र योजना तैयार करने का निर्देश दिया. उन्होंने ऐसी जल संरचनाएं विकसित करने पर जोर दिया, जिससे छोटी नदियों में भी वर्षभर पर्याप्त पानी उपलब्ध रह सके. अगर कोसी-मेची परियोजना निर्धारित समय पर पूरी होती है तो आने वाले वर्षों में पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और कटिहार समेत पूरे कोसी सीमांचल में खेती और जल प्रबंधन की तस्वीर बदल सकती है.
कभी जिस कोसी को किसानों के लिए अभिशाप कहा जाता था, उसी का नियंत्रित पानी अब खेतों के लिए वरदान बनने की दिशा में बढ़ रहा है. किसानों की नजर अब इस बात पर है कि परियोजना कितनी तेजी से जमीन पर उतरती है और तय समय तक इसका लाभ खेतों तक पहुंच पाता है.











