चीन में राष्ट्रपति नहीं लेंगे युद्ध का फैसला: अमेरिका से भारत तक… हमले का जवाब देने का डिसीजन कैसे होता है?

पिछले कुछ समय में दुनियाभर के कई देशों में युद्ध जैसी स्थिति आई है और कई जगह तो युद्ध हुआ भी है. इसी बीच चीन को ताइवान, जापान और फिलिपींस से भी युद्ध की आशंका लग रही है, जिसके चलते उसने उसने नया कानून लागू किया है. इस नए कानून के मुताबिक, चीन में युद्ध की स्थिति में सेना के अधिकारी अपने स्तर पर हमले का फैसला ले सकते हैं. अब चीन के इस नए कानून के बीच सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर दुनिया में जब भी किसी देश के सामने युद्ध जैसी स्थिति आती है, तो युद्ध का फैसला कौन लेता है?
अलग-अलग देशों में इसका जवाब अलग है. कहीं सेना पर नागरिक सरकार का नियंत्रण होता है, कहीं संसद की भूमिका काफी मजबूत होती है और कहीं सरकार को सैन्य कार्रवाई का फैसला लेने में ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं. चीन, अमेरिका, भारत, ब्रिटेन और इजराइल जैसे देशों की व्यवस्था को देखें तो पांचों जगह युद्ध से जुड़े फैसले लेने का तरीका एक जैसा नहीं है. इन देशों में संविधान, कानून और सरकार की शक्तियां तय करती हैं कि युद्ध या बड़े सैन्य अभियान का अंतिम फैसला किस स्तर पर लिया जाएगा. यही वजह है कि किसी देश में राष्ट्रपति का पद सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देता है, तो किसी देश में प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल मिलकर फैसला लेते हैं.
युद्ध के फैसले में कई चीजें तय करनी होती है
युद्ध का फैसला सिर्फ यह तय करना नहीं होता कि सेना कब हमला करेगी. इसके पीछे देश की सुरक्षा, विदेश नीति, संसद, कानून, सेना और राजनीतिक नेतृत्व की बड़ी भूमिका होती है. कई देशों में औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा और सैन्य कार्रवाई शुरू करने के अधिकार अलग-अलग हो सकते हैं. जैसे कि, अमेरिका में युद्ध की घोषणा करने का संवैधानिक अधिकार कांग्रेस के पास है, लेकिन राष्ट्रपति सेना के कमांडर-इन-चीफ होते हैं और कुछ परिस्थितियों में बिना औपचारिक युद्ध घोषणा के भी सैन्य कार्रवाई का आदेश दे सकते हैं. भारत में राष्ट्रपति के नाम पर युद्ध की घोषणा या संधि से जुड़े अधिकार हैं, लेकिन व्यवहार में फैसले निर्वाचित सरकार की सलाह और संवैधानिक व्यवस्था के तहत लिए जाते हैं.











