शिक्षा या शोषण? बच्चों के हाथों में झाड़ू, बीईओ की कुर्सी पर राजनीतिक कवच, सरकार की चुप्पी पर उठे सवाल

सूरजपुर: सूरजपुर जिले के प्रतापपुर विकासखंड अंतर्गत वासुदेवपुर दवनकरा स्थित शासकीय स्कूल से सामने आया वीडियो अब सिर्फ बच्चों से सफाई कराने का मामला नहीं रहा, बल्कि यह खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) की वर्षों से चली आ रही लापरवाही, कमजोर मॉनिटरिंग और कथित राजनीतिक संरक्षण की परतें खोलने लगा है. वीडियो में नन्हे बच्चों को शौचालय और स्कूल परिसर की सफाई करते देखा गया, जिसने पूरे शिक्षा तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
वीडियो सामने आते ही गांव में भारी आक्रोश फैल गया. अभिभावकों का साफ कहना है कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल भेजते हैं, प्रशासन की नाकामी ढोने के लिए नहीं. ग्रामीण फुलसाय पैकरा ने तीखे शब्दों में कहा कि यदि स्कूल में सफाईकर्मी नहीं है तो यह जिम्मेदारी शिक्षा विभाग और बीईओ की है, बच्चों की नहीं. यह बच्चों के भविष्य और आत्मसम्मान के साथ सीधा खिलवाड़ है.
गांव के उप सरपंच मुकेश राजवाड़े ने आरोपों की पुष्टि करते हुए बताया कि यह कोई एक दिन की घटना नहीं है. लंबे समय से स्कूल में बच्चों से सफाई करवाई जा रहीरही. उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इतने वर्षों तक बीईओ और विभागीय अधिकारी आंख मूंदे क्या करते रहे? क्या कभी जमीनी निरीक्षण हुआ या केवल कागजी खानापूर्ति चलती रही?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बच्चों को यह कहकर डराया जाता रहा कि यदि वे सफाई नहीं करेंगे तो स्कूल में कोई दूसरा कर्मचारी नहीं आएगा। यह डर का माहौल तभी बनता है जब ऊपर से सख्त निगरानी और जवाबदेही पूरी तरह गायब हो. यदि बीईओ नियमित और ईमानदार मॉनिटरिंग करते, तो यह अमानवीय स्थिति पैदा ही नहीं होती.
जब इस पूरे मामले में प्रतापपुर के बीईओ मुन्नूलाल धुर्वे का बयान सामने आया, तो उन्होंने बच्चों से सफाई कराए जाने को गंभीर अपराध तो बताया, लेकिन साथ ही स्थानीय विवाद का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश भी की. बीईओ का कहना है कि जिस परिवार ने स्कूल के लिए जमीन दान की थी, वह अपने व्यक्ति को स्वीपर नियुक्त कराने का दबाव बना रहा था, इसलिए नियुक्ति नहीं होविवा.
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्थानीय विवाद बीईओ की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी से ऊपर है? यदि विवाद था तो अस्थायी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? यदि विवाद लंबे समय से चला आ रहा था तो उच्च अधिकारियों और कलेक्टर को समय रहते क्यों नहीं अवगत कराया गया? और सबसे अहम—जब बच्चे रोज झाड़ू लगा रहे थे, तब बीईओ की मॉनिटरिंग टीम कहां थी?
सबसे गंभीर आरोप यह है कि बीईओ मुन्नूलाल धुर्वे निलंबन के बावजूद भी बीते करीब 8–9 वर्षों से प्रभारी बीईओ के पद पर कुंठी मारकर जमे हुए हैं. बार-बार शिकायतें होने, शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी लगातार शिकायतें सामने आने के बावजूद उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई—यह सवाल अब सीधे सरकार और शासन-प्रशासन पर खड़ा हो रहा है। क्या राजनीतिक संरक्षण के चलते कार्रवाई से बचाया जा रहा है?
बीईओ ने यह जरूर कहा कि जांच के बाद शिक्षक प्रदीप और राकेश दोषी पाए गए तो कार्रवाई होगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल शिक्षकों पर कार्रवाई कर बीईओ अपनी जवाबदेही से बच सकते हैं? वर्षों से चले आ रहे इस हालात की जिम्मेदारी किसकी है—यह तय होना बाकी है.
मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर सूरजपुर एस. जयवर्धन ने कहा है कि प्रकरण की जांच कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शिक्षा विभाग को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं और पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जाएगी.
वासुदेवपुर दवनकरा स्कूल का यह मामला एक स्कूल तक सीमित नहीं है. यह पूरे शिक्षा तंत्र, खासकर बीईओ स्तर पर जमी निष्क्रियता, राजनीतिक संरक्षण और जवाबदेही की कमी का आईना है. अब देखना यह होगा कि यह जांच भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दफन हो जाती है या फिर वास्तव में जिम्मेदार अधिकारियों तक कार्रवाई की आंच पहुंचती है.










