टैबलेट TG-BEX से रोसुवास तक… कैंसर की इन दवाओं में जमकर हो रही लूट, जानिए कौन तय करता है कीमत

कैंसर का नाम सुनते ही किसी भी परिवार के सामने बीमारी के साथ-साथ इलाज के खर्च की चिंता भी खड़ी हो जाती है. दवाओं, जांच और अस्पताल के खर्च के बीच अगर किसी जरूरी दवा की कीमत उसके खरीद रेट से कई गुना ज्यादा हो, तो मरीज के परिवार पर बोझ और बढ़ जाता है. अब दवाओं की कीमत और MRP के इसी बड़े अंतर का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में उठा है.

22 सितंबर 2026 को दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने एक कैंसर की दवा का उदाहरण रखा गया. इसमें बताया गया कि जिस दवा को फुटकर दुकानदार करीब 2,700 रुपये में खरीदता है, उसकी MRP 27,000 रुपये है.

दवाओं के रेट में 10 गुना अंतर

यानी दोनों कीमतों में करीब 10 गुना का अंतर बताया गया. इस अंतर पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि जीवन बचाने वाली दवाओं की कीमत इतनी ज्यादा क्यों हो सकती है. सुनवाई में यह भी कहा गया कि कई परिवार इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी संपत्ति और गहने तक बेचने को मजबूर हो जाते हैं. मामला केवल एक कैंसर की दवा की कीमत तक सीमित नहीं है.

‘जबरन वसूली नहीं है तो और क्या’

सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से कई दवाओं के दामों का उदाहरण दिया गया. कोर्ट ने इस अंतर को भी समझने की कोशिश की. ये आंकड़े और दलीलें सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं किशन चंद जैन और की ओर से रखी गई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस मामले में अंतिम फैसला नहीं दिया है.

अगली सुनवाई 29 सितंबर को होनी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘यह बिल्कुल चौंकाने वाली बात है कि जरूरी कैंसर की दवा का MRP 27,000 रुपये है, जबकि रिटेलर को यह 2,700 रुपये में दी जा रही है. रिटेलर को दी जाने वाली कीमत से MRP 10 गुना है.’ कोर्ट ने कहा कि अगर यह जबरन वसूली नहीं है तो और क्या है?

कौन से आंकड़े आए सामने?

सुप्रीम कोर्ट में सामने आए ये बड़े मुद्दे-

27,000 रुपये बनाम 2,700 रुपये:
कोर्ट के सामने ऐसी कैंसर दवा का उदाहरण आया, जिसकी फुटकर कीमत करीब 2,700 रुपये और MRP 27,000 रुपये बताई गई.

TG-BEX की कीमत का अंतर:
डॉ संजय कुलश्रेष्ठ ने TG-BEX की MRP और बिक्री कीमत में करीब 1,500 फीसदी अंतर का दावा किया.

रोसुवास का मामला:
बिना तय कीमत वाली कैटेगरी की रोसुवास की स्ट्रिप करीब 240 रुपये बताई गई, जबकि एस्पिरिन वाला कॉम्बिनेशन करीब 70 रुपये का बताया गया.

82 फीसदी दवाएं तय कीमत की लिस्ट से बाहर होने का दावा:
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन के मुताबिक करीब 82 फीसदी दवाएं ऐसी कैटेगरी में आती हैं, जिन पर तय अधिकतम कीमत लागू नहीं होती.

करीब 60 हजार दवा ब्रांड का दावा:
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि बाजार में करीब 60 हजार दवा ब्रांड हैं, जबकि कीमत तय करने की व्यवस्था 5 हजार से कम दवाओं को कवर करती है.

MRP और खरीद कीमत में अंतर क्यों?

भारत में जरूरी दवाओं की कीमत नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 लागू है. जरूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) तय करती है.

वहीं, लिस्ट से बाहर की दवाओं की शुरुआती MRP तय करने में कंपनियों की भूमिका होती है. हालांकि, इनके दाम बढ़ाने पर भी डीपीसीओ के तहत नियम लागू होते हैं. यही वजह है कि MRP और खरीद कीमत में बड़ा अंतर देखने को मिल सकता है. निर्माता से रिटेलर को दवाएं 10 फीसदी मार्जिन पर मिल जाती हैं.

अस्पताल की फार्मेसी और मरीज का खर्च

सुनवाई में अस्पतालों की दवा दुकानों का मुद्दा भी सामने आया. याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि कुछ बड़े अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए कहा जाता है और उनसे MRP वसूली जाती है. ऐसी स्थिति में मरीज के पास उसी दवा को दूसरी दुकान से कम कीमत पर खरीदने का ऑप्शन लिमिटेड हो सकता है.

सरकार और दवा कंपनियों ने क्या कहा?

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार मामले को टकराव के तौर पर नहीं देख रही है और जहां सुधार की जरूरत होगी, उस पर विचार किया जा सकता है. उन्होंने कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने वाली प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना का भी उल्लेख किया. कोर्ट ने इस पर सवाल किया कि जिन मरीजों की जरूरी दवाएं जनऔषधि केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए क्या व्यवस्था होगी.

वहीं इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि ऊंची कीमतों के लिए केवल दवा बनाने वाली कंपनियों को जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए और दुकानदारों के मुनाफे को भी देखना चाहिए. इस पर कोर्ट ने कहा कि MRP तय करने में दवा बनाने वाली कंपनी की भूमिका होती है.

डॉ संजय कुलश्रेष्ठ ने जेनेरिक दवाओं, महंगी दवाओं और सबस्टैंडर्ड दवाओं को लेकर भी चिंता जताई. उनका तर्क था कि जेनेरिक दवाएं सस्ती हो सकती है, लेकिन उसकी क्वालिटी और निर्माता के चुनाव को लेकर मरीजों के सामने अलग सवाल खड़े होते हैं. उन्होंने कहा कि जब कोई डॉक्टर बिना ब्रांड के नाम के दवा लिखता है तो फार्मासिस्ट फायदे के हिसाब से देखता है.

कौन तय करता है दाम?

दवाओं के दाम आखिर तय कौन करता है?

भारत में दवाओं में शुरुआती कीमत तय करने की व्यवस्था अलग है. यही वजह है कि किसी दवा की कीमत समझते समय सिर्फ MRP देखना पर्याप्त नहीं होता. यह भी देखना जरूरी है कि वह दवा किस कैटेगरी में आती है, उसकी कीमतों को कंट्रोल करने वाली प्रमुख संस्था NPA है. यह फार्मास्यूटिकल्स विभाग के तहत काम करती है.

सरकार DPCO के जरिए दाम कंट्रोल का ढांचा तय करती है और National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) उसी व्यवस्था के तहत अधिकतम कीमत तय करती है. जरूरी दवाओं की नेशनल लिस्ट में शामिल दवाओं के लिए अधिकतम कीमत तय की जाती है. वहीं, लिस्ट से बाहर की दवाओं में शुरुआती कीमत तय करने की व्यवस्था अलग है.

भारत में DPCO 2013 के तहत दवाओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है:
1. शेड्यूल्ड दवाएं: इनमें जरूरी और जीवन रक्षक दवाएं शामिल हैं. इनकी कीमत NPPA तय करता है और कंपनियां तय सीमा से ज्यादा एमआरपी नहीं रख सकतीं, ये करीब 18% दवाएं हैं.

2. नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं: ये करीब 82% दवाओं का हिस्सा हैं. इनकी कीमत तय करने के लिए कोई निश्चित सरकारी सीमा नहीं है, इसलिए कंपनियां खुद एमआरपी तय करती हैं. इससे कई बार उत्पादन लागत और एमआरपी में बड़ा अंतर हो सकता है.

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पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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