भारत भरोसेमंद साझेदार, डिफेंस एक्सपोर्ट लाइसेंस डील में नहीं आएगी रुकावट… जर्मनी के नए राजदूत डॉ. वीक

भारत और जर्मनी दोनों के बीच संबंध बहुत पुराने हैं. राजनयिक स्तर पर दोनों के बीच कई मसलों पर सहमति भी रही है. भारत-जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग को नई रफ्तार देने की तैयारी चल रही है. भारत में जर्मनी के नए राजदूत डॉ. जैस्पर वीक ने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा साझेदारी पिछले कुछ सालों में तेजी से मजबूत हुई है. जर्मन राजदूत ने भारत के लिए जर्मनी की ओर से बड़ा डिफेंस ऑफर दिया गया है. डील के दौरान हथियारों के एक्सपोर्ट लाइसेंस और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर कोई अड़चन भी नहीं होगी.
जैस्पर वीक ने आज बुधवार को कहा कि भारत की ओर से जरूरी मंजूरी मिलने के बाद जर्मनी भारत के साथ प्रस्तावित पनडुब्बी साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत और जर्मनी रक्षा औद्योगिक सहयोग को नई दिशा देने के लिए जर्मनी ने भारत को एक भरोसेमंद साझेदार मानते हुए रक्षा निर्यात लाइसेंस के मामले में अपना रुख काफी उदार किया है. उन्होंने कहा कि अब इस साझेदारी के सामने कोई बड़ी रुकावट नहीं है.
‘तरंग शक्ति एयर एक्सरसाइज में साझा भागीदारी’
जर्मन राजदूत ने कहा कि भारत में होने वाले तरंग शक्ति (Tarang Shakti) एयर एक्सरसाइज में जर्मनी की भागीदारी, जर्मनी A400M ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के साथ अभ्यास में शामिल होगा. इससे पहले जर्मनी Eurofighter के साथ भारतीय सैन्य अभ्यासों में हिस्सा ले चुका है.
भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग को नई रफ्तार देने की तैयारी चल रही है. जैस्पर वीक ने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा साझेदारी पिछले कुछ सालों में तेजी से मजबूत हुई है. भारत में होने वाले तरंग शक्ति एयर एक्सरसाइज में जर्मनी की भागीदारी, जर्मनी A400M ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के साथ अभ्यास में शामिल होगा. इससे पहले जर्मनी Eurofighter के साथ भारतीय सैन्य अभ्यासों में हिस्सा ले चुका है.
‘मैरिटाइम सिक्योरिटी में जर्मनी की बड़ी भागीदारी’
MILAN नौसैनिक अभ्यास में भी जर्मनी की भागीदारी, इस साल की शुरुआत में जर्मनी ने P-8 maritime patrol aircraft के साथ अभ्यास में हिस्सा लिया था. राजदूत ने कहा कि भारत भी P-8 विमान संचालित करता है, इसलिए दोनों देशों की सेनाओं के बीच interoperability बढ़ाने की अच्छी संभावना है. इंडो-पैसिफिक मैरिटाइम सिक्योरिटी में जर्मनी की बड़ी भागीदारी को लेकर राजदूत ने बताया कि पिछले करीब 2 महीनों से जर्मनी का एक liaison officer दिल्ली स्थित Indo-Pacific Information Fusion Centre में तैनात है.
जर्मन अधिकारी हिंद महासागर में मैरिटाइम एवेयरनेस और सूचना शेयरिंग में भाग ले रहा है. राजदूत के मुताबिक इसका महत्व जर्मनी के व्यापार और व्यवसायिक शिपिंग के लिए भी है.
भारत-जर्मनी रक्षा उद्योग सहयोग पर बड़ा बयान
भारत-जर्मनी रक्षा औद्योगिक सहयोग को नई दिशा देने की तैयारी, राजदूत वीक ने कहा कि दोनों देशों ने अप्रैल 2026 में रक्षा मंत्रियों की मौजूदगी में Defence Industrial Roadmap पर हस्ताक्षर किए हैं. जर्मनी-भारत पनडुब्बी सौदे को लेकर राजदूत ने कहा कि पनडुब्बी डील का टेक्स्ट लगभग पूरा हो चुका है, लेकिन अभी उस पर हस्ताक्षर होना बाकी है.
उन्होंने यह भी कहा कि जर्मनी ने रक्षा निर्यात लाइसेंसिंग नीति में बड़ा बदलाव किया है. भारत को विश्वस्त साझेदार मानते हुए जर्मनी अब defence export licences को लेकर ज्यादा forward-leaning है. राजदूत के मुताबिक इससे भारत-जर्मनी रक्षा औद्योगिक सहयोग के सामने मौजूद बड़ी रुकावटें कम होंगी और सहयोग को नई दिशा मिल सकेगी.
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर राजदूत ने कहा कि रक्षा सहयोग में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर अहम है, क्योंकि भारत अपनी रक्षा क्षमताओं में indigenous production और development बढ़ाना चाहता है. राजदूत ने कहा कि भारत और जर्मनी दोनों अपने रक्षा क्षेत्र में बड़े निवेश कर रहे हैं और दोनों देशों के सामने जटिल भू-रणनीतिक परिस्थितियां हैं. मजबूत रक्षा क्षमताएं दोनों देशों की सुरक्षा, शांति और राष्ट्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं.
‘क्षेत्रीय चुनावों में AfD की बढ़त से कोई असर नहीं’
जर्मन राजदूत ने अपने यहां हो रहे क्षेत्रीय चुनावों में AfD पार्टी की बढ़त को बड़ा मामला करार नहीं दिया. उनका मानना है कि क्षेत्रीय चुनावों के नतीजों का भारत-जर्मनी रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. हाल में सैक्सोनी-आनहॉल्ट, मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमर्न और बर्लिन में हुए क्षेत्रीय चुनावों में दक्षिणपंथी पार्टी AfD के वोट में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली है.
उन्होंने कहा कि इन चुनाव नतीजों के बावजूद भारत और जर्मनी की साझेदारी मजबूत बनी रहेगी और इसका असर दोनों देशों के बीच मौजूदा सहयोग पर नहीं पड़ेगा. राजदूत के मुताबिक विदेश नीति, सुरक्षा नीति, प्रवासन नीति, आर्थिक नीति और व्यापार जैसे विषय संघीय सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. क्षेत्रीय सरकारों के पास इन संघीय नीतियों को तय करने का अधिकार नहीं है.
उन्होंने कहा कि इसलिए क्षेत्रीय चुनावों के परिणामों को भारत-जर्मनी संबंधों की दिशा से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. राजदूत ने यह भी स्पष्ट किया कि तीनों राज्यों में AfD को अकेले सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला है. उन्होंने मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमर्न और बर्लिन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां वामपंथी राजनीतिक स्पेक्ट्रम के पास बहुमत समूह मौजूद है, जो सरकार बनाने की स्थिति में हो सकता है. जबकि बर्लिन में AfD तीसरे स्थान पर रही, इसलिए वहां भी चुनाव परिणाम की तस्वीर AfD के अकेले सरकार बनाने वाली नहीं है.
जर्मन राजदूत ने यह भी कहा कि इन चुनावों को पूरे जर्मनी की राजनीतिक तस्वीर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ये छोटे राज्यों के क्षेत्रीय चुनाव हैं. उन्होंने आंकड़ा देते हुए कहा कि सैक्सोनी-आनहॉल्ट में करीब 17 लाख और मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमर्न में करीब 13 लाख पात्र मतदाता हैं.
राजदूत ने संकेत दिया कि माइग्रेशन मोबिलिटी पार्टनरशिप, तकनीकी सहयोग, विकास सहयोग और भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते जैसे मुद्दे संघीय और यूरोपीय स्तर की नीतियों के तहत आगे बढ़ेंगे.
‘रणनीतिक साझेदारी पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण’
भारत और जर्मनी के बीच की रणनीतिक साझेदारी आज दोनों के लिए पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. भारत में जर्मनी के नए राजदूत डॉ. वीक ने कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल में दोनों देशों के बीच भरोसे और स्थिरता पर आधारित संबंधों का महत्व बढ़ गया है. उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय अनिश्चितता, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भरोसे की कमी और बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रही है. ऐसे माहौल में भारत-जर्मनी साझेदारी भरोसे, पूर्वानुमेयता और आपसी विश्वास पर आधारित है. उन्होंने कहा कि भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी साल 2000 में शुरू हुई थी, लेकिन आज इसका महत्व पिछले 26 सालों की तुलना में कहीं अधिक है.
यूरोप की स्थिति पर राजदूत ने रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र किया और कहा कि रूस के युद्ध ने यूरोप में भरोसे, शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचाया है. इंडो- पैसिफिक की स्थिति पर उन्होंने कहा कि चीन के अधिक मुखर और संशोधनवादी रुख से भारत के सामने भी विशिष्ट चुनौतियां पैदा होती हैं.
उन्होंने अमेरिका का भी जिक्र किया और कहा कि अमेरिका जर्मनी का दशकों से सबसे महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार रहा है, लेकिन अमेरिका के लगातार बदलते नीतिगत रुख से सहयोग कुछ मुश्किल हो रहा है.
भारत-EU में FTA हमारी बड़ी प्राथमिकता
नए जर्मन राजदूत ने अपने कार्यकाल की पहली प्राथमिकता भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना बताया. उन्होंने कहा कि समझौता इस साल के अंत तक हस्ताक्षरित होने और भारत तथा यूरोपीय संसद से अनुमोदन के बाद लागू होने की उम्मीद है. राजदूत के मुताबिक उनका और जर्मन दूतावास का फोकस भारतीय और जर्मन कंपनियों को साथ लाने, बिजनेस मैचमेकिंग बढ़ाने और निवेश एवं व्यापार को बढ़ावा देने पर रहेगा.
उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों का आकलन है कि FTA में अगले पांच वर्षों में भारत-जर्मनी व्यापार को दोगुना करने की क्षमता है. राजदूत ने बताया कि उनके भारत आने के छह सप्ताह के भीतर ही जर्मनी से 2 बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भारत आ चुके हैं.
इनमें हेस्से के मुख्यमंत्री बोरिस राइन के नेतृत्व में आया कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी शामिल था.
ग्रीन एनर्जी और AI पर भी फोकसः डॉ. वीक
भारत-जर्मनी के ग्रीन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट पार्टनरशिप को भी राजदूत ने अहम मंच बताया. उन्होंने कहा कि दोनों देश नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और क्लीन टेक्नोलॉजी समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा सकते हैं. राजदूत ने बताया कि फरवरी से भारत और जर्मनी के बीच द्विपक्षीय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पैक्ट भी मौजूद है.
राजदूत ने अपने दूसरे प्रमुख फोकस के तौर पर लेबर माइग्रेशन और छात्र आदान-प्रदान को रखा. उन्होंने कहा कि लोगों के बीच संपर्क भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी की बुनियाद है. जर्मनी में भारतीय छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी का जिक्र करते हुए राजदूत ने कहा कि 2020 के आसपास करीब 20 हजार भारतीय छात्र जर्मनी में थे, जबकि अब यह संख्या करीब 70 हजार हो गई है.
उन्होंने संकेत दिया कि कुशल भारतीय श्रमिकों की जर्मनी में आवाजाही और छात्र आदान-प्रदान आने वाले समय में द्विपक्षीय संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा.











