भारत में बिक रहे ग्लोबल ब्रांड्स पर सवाल: फैंटा में ज्यादा चीनी, किटकैट में कम कोको और मैगी में पाम ऑयल का इस्तेमाल

नई दिल्ली, 25 अगस्त 2026। ग्लोबल फूड कंपनियों के एक ही ब्रांड के प्रोडक्ट अलग-अलग देशों में अलग गुणवत्ता और सामग्री के साथ बेचे जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बिकने वाले कई लोकप्रिय पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स में विदेशों की तुलना में ज्यादा चीनी, नमक और सस्ते तेल का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, कई देशों में ऐसे उत्पादों पर पैकेट के सामने ही स्पष्ट चेतावनी दी जाती है, जबकि भारत में पोषण संबंधी जानकारी मुख्य रूप से पैकेट के पीछे दी जाती है।
फैंटा में चीनी का बड़ा अंतर
रिपोर्ट में फैंटा का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि ब्रिटेन में बिकने वाले एक कैन में करीब 63 कैलोरी होती हैं, जबकि भारत में इसी ब्रांड के उत्पाद में चीनी की मात्रा काफी अधिक बताई गई है। यूरोप में कुछ आर्टिफिशियल रंगों के इस्तेमाल को लेकर पैकेजिंग पर स्पष्ट चेतावनी देना जरूरी है, जबकि भारत में संबंधित जानकारी छोटे अक्षरों में पीछे दी जाती है।
किटकैट में कोको की मात्रा पर सवाल
भारत और ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले किटकैट की तुलना में भी अंतर सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बिकने वाले आम किटकैट में कोको सॉलिड करीब 4.5 फीसदी है, जबकि ऑस्ट्रेलिया के कुछ संस्करणों में मिल्क चॉकलेट में कम से कम 22 फीसदी कोको सॉलिड बताया गया है। भारतीय उत्पाद में बाकी हिस्से में चीनी, मिल्क पाउडर और वेजिटेबल फैट शामिल होते हैं।
मैगी की रेसिपी में भी अंतर
मैगी के मामले में भी भारत और ब्रिटेन के उत्पादों की तुलना की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बिकने वाले मैगी के वेरिएंट में पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है, जबकि ब्रिटेन में उपलब्ध कई संस्करणों में सनफ्लावर ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है। खास बात यह है कि ब्रिटेन में बिकने वाले कुछ पैकेट भारत में ही तैयार होते हैं, लेकिन वहां पैकेट के सामने पोषण संबंधी चेतावनी दिखाई देती है।
बेबी फूड में चीनी को लेकर विवाद
नेस्ले ने 2024 में भारत में बिना अतिरिक्त चीनी वाला सेरेलैक लॉन्च करने की घोषणा की थी। इससे पहले लंबे समय तक भारत में बिकने वाले सेरेलैक में अतिरिक्त चीनी की मौजूदगी को लेकर सवाल उठते रहे। कार्यकर्ताओं और उपभोक्ता समूहों ने इस मुद्दे को लगातार उठाया था।
कंपनियों का क्या तर्क है?
फूड कंपनियों का कहना है कि अलग-अलग देशों में लोगों की पसंद, स्वाद, कीमत और खरीदने की क्षमता अलग होती है। इसी वजह से उत्पादों की रेसिपी और सामग्री में बदलाव किया जाता है। कंपनियों के मुताबिक, कम कीमत में उत्पाद उपलब्ध कराने के लिए कच्चे माल का चयन भी बाजार के हिसाब से किया जाता है।
हालांकि, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का सवाल है कि कीमत या स्वाद के आधार पर रेसिपी में बदलाव अलग बात है, लेकिन उपभोक्ताओं को उत्पाद की गुणवत्ता और उसमें मौजूद चीनी, नमक व फैट की स्पष्ट जानकारी देना जरूरी है।
भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग की बहस
भारत में पैकेट के सामने रंगीन चेतावनी वाले लेबल को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। कई देशों में लाल, पीले और हरे संकेतों के जरिए उपभोक्ताओं को एक नजर में बताया जाता है कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या फैट की मात्रा कितनी है।
भारत में इस तरह की व्यवस्था को लेकर 2017 से चर्चा होती रही है। हालिया प्रक्रिया में एफएसएसएआई ने पैकेट के सामने रंगीन चेतावनी के बजाय काले-सफेद पोषण संबंधी टेबल को प्रमुखता देने का सुझाव दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा मामला
फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबलिंग का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिका पर अदालत ने खाद्य नियामक से इस व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने को कहा था। अदालत ने अन्य देशों में लागू चेतावनी आधारित लेबलिंग सिस्टम का अध्ययन करने की बात भी कही।
मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
पैकेज्ड फूड और बेवरेज का भारतीय बाजार तेजी से बढ़ रहा है। वहीं, ज्यादा चीनी, नमक और फैट वाले खाद्य पदार्थों के बढ़ते सेवन को मोटापा और अन्य जीवनशैली संबंधी स्वास्थ्य जोखिमों से जोड़ा जाता है। ऐसे में उपभोक्ताओं को खरीदारी से पहले उत्पाद की वास्तविक पोषण संरचना समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।
ग्राहक पैकेट खरीदते समय क्या देखें?
जब तक पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी व्यवस्था लागू नहीं होती, उपभोक्ताओं को पैकेट के पीछे दी गई जानकारी जरूर पढ़नी चाहिए। खास तौर पर प्रति 100 ग्राम या 100 मिलीलीटर में चीनी, नमक और फैट की मात्रा देखें। इसके अलावा सामग्री की सूची भी ध्यान से पढ़ें। किसी सामग्री का नाम सूची में जितना पहले होता है, आम तौर पर उसकी मात्रा उतनी अधिक होती है।
नोट: फैंटा, किटकैट और मैगी से जुड़े आंकड़े संबंधित उत्पादों के लेबल और कंपनियों की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित बताए गए हैं। अलग-अलग देशों में उत्पादों की रेसिपी और पोषण संरचना समय के साथ बदल सकती है।











