NATO और EU को अंदर से तोड़ना चाहता है रूस? पुतिन की सीक्रेट स्ट्रेटजी

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कथित तौर पर अपनी सेना और खुफिया एजेंसियों को NATO और यूरोपीय संघ यानी EU को अंदर से कमजोर करने का लक्ष्य दिया है. द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2025 में क्रेमलिन में हुई सीक्रेट बैठक में यह रणनीति बनाई गई थी. रिपोर्ट दो देशों के उन खुफिया अधिकारियों की जानकारी पर आधारित है, जिन्हें इस बैठक के बारे में जानकारी थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस की योजना दो हिस्सों में है. पहला, NATO की एकजुटता और सामूहिक रक्षा की नीति को परखना. दूसरा, मोल्दोवा को राजनीतिक और आर्थिक रूप से अस्थिर करना. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि रूस इस साल शरद ऋतु में NATO की प्रतिक्रिया को परखने की कोशिश कर सकता है. इसके लिए साइबर हमले, जरूरी बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाना और NATO की पूर्वी सीमा पर हथियारबंद समूहों की घुसपैठ जैसे तरीके अपनाए जा सकते हैं.
मोल्दोवा क्यों इतना अहम है?
पश्चिमी खुफिया अधिकारियों के मुताबिक, सीधे NATO से युद्ध किए बिना यूरोप में अस्थिरता फैलाने के लिए मोल्दोवा रूस की बड़ी कड़ी है. अधिकारियों का कहना है कि यूक्रेन पर कब्जा करना पुतिन की पहली प्राथमिकता है, जबकि मोल्दोवा पर नियंत्रण हासिल करना दूसरी प्राथमिकता है.
रिपोर्ट में दावा है कि रूस दक्षिणी यूक्रेन पर कब्जा करके अपने कब्जे वाले इलाकों से मोल्दोवा तक जमीन का सीधा रास्ता बनाना चाहता है. करीब 24 लाख आबादी वाला मोल्दोवा यूक्रेन और NATO सदस्य रोमानिया के बीच है. रूस की सेना पहले से ही मोल्दोवा के अलगाववादी इलाके ट्रांसनिस्ट्रिया में मौजूद है. यहां रूसी सैनिक कई वर्षों से तैनात हैं. इससे रूस की सेना मोल्दोवा की राजधानी किशिनाउ के काफी करीब है.
मोल्दोवा पर दबाव कैसे बढ़ रहा है?
रूस पर सिर्फ भविष्य में सैन्य कार्रवाई की तैयारी का आरोप नहीं है. हाल के घटनाक्रमों ने भी मोल्दोवा की कमजोरी दिखाई है. मार्च में यूक्रेन के एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट पर रूसी हमले के बाद डिनिस्टर नदी में तेल फैल गया, जिससे मोल्दोवा के तीसरे सबसे बड़े शहर की पानी की सप्लाई प्रभावित हुई. इसके बाद पश्चिमी यूक्रेन में बिजली की हाई-वोल्टेज लाइनों पर ड्रोन हमले हुए. इन लाइनों से मोल्दोवा को बिजली का बड़ा हिस्सा मिलता है.
जर्मनी के चीफ ऑफ डिफेंस जनरल कार्स्टन ब्रॉयर ने कहा है कि यूरोप की पूर्वी सीमा पर ऐसे हाइब्रिड हमले रोज हो रहे हैं.
NATO को लेकर यूरोप क्यों डरा हुआ है?
रूस की संभावित कार्रवाई को देखते हुए पोलैंड और बाल्टिक देश लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया अपने बांधों, बिजलीघरों और गैस नेटवर्क जैसे जरूरी बुनियादी ढांचे की सुरक्षा बढ़ा रहे हैं. उन्हें डर है कि रूस यूक्रेन में बने ड्रोन का इस्तेमाल फॉल्स-फ्लैग हमलों में कर सकता है.
एक बाल्टिक खुफिया अफसर के मुताबिक, ऐसे हमलों का मकसद सिर्फ इमारत या बुनियादी ढांचा नष्ट करना नहीं होगा. असली लक्ष्य NATO के अंदर राजनीतिक भ्रम और मतभेद पैदा करना हो सकता है. इससे अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच यह बहस शुरू होगी कि हमले के पीछे कौन है और क्या NATO को सामूहिक रूप से जवाब देना चाहिए. यानी रूस सीधे NATO से युद्ध किए बिना उसकी एकजुटता को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है.











