बस्तर में लौट रही पढ़ाई की रौनक, 21 साल बाद फिर गूंजी स्कूल की घंटी

छत्तीसगढ़ के बस्तर में कभी नक्सलवाद के कारण बंद हुए स्कूलों में अब दोबारा बच्चों की आवाज सुनाई दे रही है। सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के बाद बीजापुर और नारायणपुर के उन इलाकों में शिक्षा व्यवस्था को फिर से खड़ा किया जा रहा है, जहां लंबे समय से स्कूल बंद थे। दोनों जिलों में कुल 52 स्कूल दोबारा संचालित किए गए हैं। इनमें करीब 1,375 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।

बीजापुर में 38 स्कूल फिर से शुरू हुए हैं, जहां करीब 1,100 बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं। वहीं नारायणपुर के 14 स्कूलों में करीब 275 बच्चे पढ़ रहे हैं। लंबे समय तक स्कूलों से दूर रहे इन इलाकों में अब शिक्षक भी पहुंच रहे हैं और गांवों में पढ़ाई का माहौल बन रहा है।

नारायणपुर के 4 गांवों में पहली बार शुरू हुई पढ़ाई

नारायणपुर में नक्सल प्रभाव के कारण लंबे समय से बंद स्कूलों को फिर से शुरू किया गया है। जिले में संचालित 14 स्कूलों में 10 ऐसे हैं, जो करीब 12 साल बाद दोबारा खुले हैं। इसके अलावा चार गांव ऐसे हैं, जहां आजादी के बाद पहली बार स्कूल शुरू हुआ है।

इन स्कूलों में करीब 275 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। जिन इलाकों में पहले स्कूल तक पहुंचना भी चुनौती था, वहां अब शिक्षक और बच्चे साथ नजर आ रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था की वापसी को ग्रामीण इलाकों में बदलाव के अहम संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

पेड़ के नीचे शुरू हुई पढ़ाई, अब बनेंगे स्कूल भवन

दंतेवाड़ा के लावा, बड़ेपल्ली और बैनपाल गांव में भी आजादी के बाद पहली बार स्कूल शुरू हुए हैं। इन तीनों स्कूलों में करीब 40 बच्चों का दाखिला हुआ है। फिलहाल इन गांवों में स्कूल भवन तैयार नहीं हैं, इसलिए पेड़ के नीचे ही बच्चों की पढ़ाई शुरू की गई।

स्कूल भवन निर्माण की स्वीकृति मिल चुकी है। ऐसे में जल्द ही इन बच्चों को स्थायी भवन में पढ़ाई की सुविधा मिलने की उम्मीद है। वहीं मुलेर समेत कुछ अन्य गांवों में सुरक्षा कारणों से दूसरे स्थानों पर संचालित किए जा रहे स्कूलों को अब उनके मूल गांवों में वापस शुरू किया गया है।

नक्सलवाद के दौर में बस्तर के कई इलाकों में स्कूल और आश्रम भी हिंसा की चपेट में आए थे। कई भवनों को बम से उड़ा दिया गया या क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। अब सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद सरकारी व्यवस्थाएं दोबारा अंदरूनी इलाकों तक पहुंच रही हैं।

सुकमा के बुर्कलंका क्षेत्र का गच्छनपल्ली गांव इसका उदाहरण है। कभी माओवादी गतिविधियों का गढ़ माने जाने वाले इस इलाके में नष्ट किए गए पुराने स्कूल की जगह नया भवन तैयार हो चुका है और उसमें पढ़ाई शुरू हो गई है। इससे लंबे समय बाद इन क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था के लौटने की तस्वीर सामने आई है।

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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