रुद्राभिषेक कब नहीं करना चाहिए? रुद्राभिषेक के लिए कौन सी तिथि शुभ?

सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है. भगवान शिव की पूजा में रुद्राभिषेक का विशेष महत्व बताया गया है. भगवान शिव के रुद्राभिषेक पूजन से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं. इससे मानसिक शांति, शारीरिक व मानसिक रोगों से मुक्ति, नकारात्मक ऊर्जा का नाश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. सावन, प्रदोष और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर कई श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से रुद्राभिषेक कराते हैं, लेकिन रुद्राभिषेक कुछ खास तिथियों पर नहीं करनी चाहिए. चलिए आपको बताते हैं रुद्राभिषेक कब नहीं करना चाहिए? रुद्राभिषेक के लिए कौन सी तिथि अच्छी है और रुद्राभिषेक पूजन सामग्री की पूरी लिस्ट.
रुद्राभिषेक का सही दिन और समय
सबसे अच्छा दिन- सोमवार का दिन और विशेष तौर पर सावन मास, महाशिवरात्रि तथा प्रदोष व्रत की तिथि रुद्राभिषेक के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है.
शिववास विचार- पंचांग देखकर यह सुनिश्चित करें कि उस दिन शिवजी का वास नंदी, गौरी या पृथ्वी पर हो या पंडित जी के अनुसार ही रुद्राभिषेक करें.
रुद्राभिषेक कब नहीं करना चाहिए
ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रुद्राभिषेक के लिए कोई सख्त निषेध नहीं माना गया है, क्योंकि भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है और उनकी पूजा किसी भी दिन श्रद्धा के साथ की जा सकती है, लेकिन इन सब के बाद भी कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. शिववास और पंचांग के नियमों के अनुसार, कृष्ण पक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी तथा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी और पूर्णिमा आदि ऐसी तिथियां हैं जब शिवजी समाधि या अन्य स्थानों पर होते हैं, अतः इन दिनों में रुद्राभिषेक करने से बचना चाहिए.
समाधि काल (श्मशान)- कृष्ण पक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, अष्टमी, पूर्णिमा
देव सभा काल- कृष्ण पक्ष की द्वितीया, नवमी और शुक्ल पक्ष की तृतीया, दशमी
क्रीड़ा काल- कृष्ण पक्ष की तृतीया, दशमी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, एकादशी
भोजन काल- कृष्ण पक्ष की षष्ठी, त्रयोदशी और शुक्ल पक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी
रुद्राभिषेक में क्या चढ़ाएं?
रुद्राभिषेक के दौरान शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी, शक्कर, बेलपत्र, धतूरा और भस्म अर्पित करनी चाहिए. इसके साथ ही “ॐ नमः शिवाय” या रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करना शुभ माना जाता है.
रुद्राभिषेक का आध्यात्मिक महत्व?
हिन्दू धर्म में रुद्राभिषेक भगवान शिव की आराधना और उपासना का सबसे श्रेष्ठ और प्रभावशाली स्वरूप माना जाता है. ‘रुद्र’ भगवान शिव का ही एक उग्र और शक्तिशाली वैदिक रूप है और ‘अभिषेक’ का अर्थ है पवित्र मंत्रों के उच्चारण के साथ शिवलिंग पर विभिन्न द्रव्यों जैसे गंगाजल, दूध, शहद आदि की धारा अर्पित करना. मान्यता है कि रुद्राभिषेक करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है.











