मुग़लों के दौर में कैसे मनाते थे क्रिसमस? जहांगीर को यीशू में दिलचस्पी और अकबर ने बनवाया इबादतखाना

भारत में क्रिसमस के इतिहास की चर्चा अक्सर ब्रिटिश राज से शुरू की जाती है, लेकिन सच्चाई यह है कि क्रिसमस का उत्सव भारत में उससे बहुत पहले, मुग़ल साम्राज्य के ज़माने में ही शुरू हो चुका था. मुग़ल बादशाहों के दौर में क्रिसमस न केवल ईसाई समुदाय के लोग मनाते थे, बल्कि यह त्योहार शाही दरबार की संस्कृति, कूटनीति और धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल भी बनकर उभरता है.

25 दिसंबर को पूरी दुनिया में क्रिसमस मनाया जाता है, यह हम सब जानते ही हैं लेकिन मुग़ल काल में क्रिसमस कैसे मनाया जाता था, इसे शाही दरबार से किस तरह का संरक्षण मिलता था, और यह त्योहार उस समय के धार्मिक व सांस्कृतिक माहौल को कैसे दर्शाता था, आइए जानते हैं.

मुग़ल दरबार में ईसाइयों की मौजूदगी

मुग़ल साम्राज्य के समय, खासकर अकबर, जहांगीर और शाहजहां के दौर में, यूरोपीय मिशनरी, व्यापारी और यात्री बड़ी संख्या में भारत आए. इनमें अनेक ईसाई मिशनरियां शामिल थीं. ये मिशनरी न केवल अपना धर्म प्रचार करते थे, बल्कि खगोल विज्ञान, चित्रकला, स्थापत्य, चिकित्सा और भाषाओं के ज्ञान के कारण दरबार में सम्मानित भी थे. इसी के साथ वे अपने धार्मिक उत्सव, ईस्टर, क्रिसमस आदि भारत की ज़मीन पर भी मनाते रहे. मुग़ल बादशाहों ने सामान्यतः ईसाई समुदाय को धार्मिक स्वतंत्रता दी. वे उनके चर्चों, मठों और त्योहारों के आयोजन में बाधा नहीं बनते थे, बल्कि कई बार खुद भी इन अवसरों में शामिल होकर उनकी हौसला अफ़ज़ाई करते थे.

अकबर और क्रिसमस का शुरुआती दौर

अकबर (1556-1605) का शासन धार्मिक सहिष्णुता और सब धर्मों के सम्मान के लिए जाना जाता है. उसने फ़तेहपुर सीकरी में इबादतख़ाना बनवाया, जहां विभिन्न धर्मों के विद्वान आपस में वाद-विवाद और संवाद करते थे. इसी वातावरण में ईसाई पादरी भी दरबार से जुड़े और अपनी धार्मिक परंपराएं लेकर आए. अकबर के ज़माने में पादरियों को दरबार में बुलाया जाता था. वे बाइबिल के चित्रित संस्करण, ईसा मसीह के जीवन से संबंधित पेंटिंग और धार्मिक ग्रंथ लेकर आते.

अकबर स्वयं धर्मांतरण नहीं करता था, लेकिन वह यह जानने में गहरी रुचि रखता था कि ईसाइयों के प्रमुख त्योहार कौन से हैं और वे कैसे मनाए जाते हैं. कई विवरणों में उल्लेख मिलता है कि क्रिसमस जैसे पर्वों पर दरबार में विशेष सभाएं होती थीं, जहां ईसाई समुदाय अपनी प्रार्थनाएं, भजन करते, और दरबारी कौतूहल से उन्हें सुनते. क्रिसमस के अवसर पर ईसाई पादरी अकबर को धार्मिक चित्र या किताबें भेंट करते, बदले में सम्राट उन्हें ख़िताब, वस्त्र या कीमती उपहार देता. इस आपसी आदान-प्रदान ने त्योहार को सांस्कृतिक महत्व भी दिया. यद्यपि उस दौर का क्रिसमस आज की तरह सार्वजनिक और बड़े पैमाने पर सड़कों पर नहीं मनाया जाता था, पर शाही दरबार के स्तर पर इसकी उपस्थिति स्पष्ट थी.

जहांगीर के समय क्रिसमस का विस्तार

जहांगीर (1605-1627) के दौर में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों, खासकर अंग्रेज़ और पुर्तगाली व्यापारियों की गतिविधियां बढ़ीं. इनके साथ और अधिक ईसाई समुदाय भारत आया. जहांगीर की स्मृतियां, यात्रा-वृत्तांतों और यूरोपीय यात्रियों के लेखों में क्रिसमस के उत्सव का ज़िक्र मिलता है. जहांगीर यूरोपीय कलाओं और चित्रकला से विशेष रूप से प्रभावित था. उसने ईसा मसीह और मदर मैरी की पेंटिंग्स बनवाने और संग्रहित करने में दिलचस्पी ली. जब क्रिसमस आता, तो दरबार में ईसाई पादरी विशेष प्रार्थना करते और मसीह के जन्म का संदेश सुनाते.

क्रिसमस के अवसर पर यूरोपीय मिशनरी और व्यापारी अक्सर विशेष भोज का आयोजन करते. मांसाहारी व्यंजन, वाइन, मीठे पकवान और यूरोपीय शैली के व्यंजन परोसे जाते. मुग़ल दरबारी और कभी कभी खुद सम्राट भी ऐसे भोज का हिस्सा बनते. जहांगीर इस तरह के आयोजनों में शामिल होकर एक तरह से यह संदेश देता था कि राज्य में केवल इस्लामी त्योहारों का नहीं, बल्कि अन्य धर्मों के त्योहारों का भी सम्मान है.

क्रिसमस में शाहजहां कीभूमिका

शाहजहां (1628-1658) का काल प्रायः वास्तु-कला और इस्लामी शानओशौकत के लिए जाना जाता है, लेकिन इस दौर में भी क्रिसमस का उत्सव, ख़ासकर कूटनीतिक स्तर पर, जारी रहा. पुर्तगाली, डच और अंग्रेज़ दूतावास क्रिसमस पर विशेष प्रार्थनासभाएं और दावतें आयोजित करते. इसमें मुग़ल अधिकारियों को आमंत्रित किया जाता, ताकि रिश्ते मधुर बने रहें. जिन बंदरगाहों और शहरों में यूरोपीय समुदाय बस चुका था, वहां बने चर्चों में आधी रात की प्रार्थना और विशेष मास होता. फिर जुलूस या छोटेछोटे जुलूस की तरह गीत गाते, मोमबत्तियां जलाते, ईसा मसीह के जन्म की कहानी का वाचन करते.

शाहजहां धार्मिक रूप से अपेक्षाकृत रूढ़िवादी माना जाता है, मगर राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से वह यूरोपीय शक्तियों से संबंध बनाए रखना चाहता था. इसलिए ईसाइयों के त्यौहारों पर कठोर प्रतिबंध नहीं लगाया गया; वे अपने समुदाय के भीतर क्रिसमस शांति से मना सकते थे.

कैसा होता था क्रिसमस त्योहार?

मुग़ल दौर का क्रिसमस आज के आधुनिक, सजावट भरे बाज़ार से काफ़ी अलग था, लेकिन कुछ मूल बातें समान भी थीं. चर्चों में मोमबत्तियां, तेल के दीये और फूलों से सजावट की जाती थी. कभीकभी स्थानीय भारतीय परंपरा के अनुसार आम और अशोक के पत्तों की तोरण भी लगाई जाती. ईसा मसीह के जन्म की झांकी लकड़ी, मिट्टी या कपड़े की गुड़ियों से सजाई जाती. क्रिसमस ईव पर रात की प्रार्थना और 25 दिसंबर की सुबह विशेष मास होता. लैटिन या पुर्तगाली भाषा में भजन गाए जाते, और धीरे धीरे कुछ भजन स्थानीय भाषाओं या फ़ारसी में भी अनुवादित होने लगे.

मांस, खासकर भुना हुआ मांस (रोस्ट), मिठाइयां, द्राक्ष का रस या वाइन, और यूरोपीय शैली के केक या मीठे व्यंजन तैयार किए जाते. अक्सर स्थानीय स्वाद के अनुसार मसालों का प्रयोग बढ़ गया था, जिससे भोजन में भारतीय और यूरोपीय शैली का मिश्रण नज़र आता. ईसाई परिवार एकदूसरे को कपड़े, मीठे पकवान, चांदी के छोटे मोटे बर्तन या धार्मिक चित्र भेंट करते. दरबार के स्तर पर, मिशनरी सम्राट को धार्मिक ग्रंथ, पेंटिंग या दुर्लभ वस्तुएं देते, और सम्राट बदले में सम्मानसूचक उपहार देता.

औरंगज़ेब और बाद के मुग़ल बादशाह क्या सोचते थे?

औरंगज़ेब (1658-1707) का शासन धार्मिक दृष्टि से अधिक कट्टर माना जाता है. उसने कुछ गैरमुस्लिम त्योहारों पर प्रतिबंध और करों में वृद्धि जैसे कदम उठाए. औरंगज़ेब के दौर में ईसाई त्योहारों को शाही स्तर पर पहले जैसी स्वीकृति या उत्साह नहीं मिला. कई यूरोपीय दस्तावेज़ों में यह उल्लेख है कि माहौल पहले जितना खुला और सहिष्णु नहीं रहा. इसके बावजूद, ईसाई समुदाय अपने क़स्बों, बंदरगाह नगरों और बस्तियों में क्रिसमस मनाते रहे. चर्चों में प्रार्थना, दावतें और धार्मिक कार्यक्रम बिना बहुत अधिक दिखावे के चलते रहे.

18वीं सदी में जब मुग़ल साम्राज्य कमजोर हुआ और क्षेत्रीय शक्तियां उभरने लगीं, तब यूरोपीय कंपनी राज का प्रभाव बढ़ा. इस समय तक क्रिसमस धीरेधीरे ब्रिटिश शासन के साथ एक अधिक व्यापक सार्वजनिक त्योहार के रूप में विकसित होने लगा, लेकिन उसकी जड़ें मुग़ल काल के आरंभिक संपर्कों तक जाती हैं.

आज भारत में क्रिसमस एक बड़ा त्यौहार है, जो केवल ईसाइयों तक सीमित नहीं रहा. इसकी ऐतिहासिक जड़ें मुग़ल काल के उन छोटेछोटे, लेकिन महत्वपूर्ण उत्सवों में भी खोजी जा सकती हैं, जहां पहली बार इस पर्व ने भारतीय जमीन पर राजकीय स्तर की मान्यता पाई. इस तरह मुग़ल काल का क्रिसमस हमें यह याद दिलाता है कि भारत की धरती पर धार्मिक विविधता और पारस्परिक सम्मान की परंपरा सदियों पुरानी है. अलगअलग धर्मों के त्योहार, चाहे वे बहुसंख्यक समुदाय के हों या अल्पसंख्यक के, हमारी साझा सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बनते रहे हैं और क्रिसमस भी इस परंपरा की एक खूबसूरत कड़ी है.

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पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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