ईरान संघर्ष के बीच अमेरिकी नीति पर सख्त संकेत, सहयोग न करने वाले देशों से सैन्य बेस हटाने की चेतावनी

ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के वरिष्ठ सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने संकेत दिया है कि जो देश युद्ध के समय अमेरिकी सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देंगे, वहां अमेरिका अपने बेस बनाए रखने पर पुनर्विचार कर सकता है। उन्होंने कहा कि यदि जरूरत के समय इन ठिकानों का उपयोग नहीं किया जा सकता, तो ऐसे देशों में उनकी मौजूदगी का कोई औचित्य नहीं है।
बताया जा रहा है कि स्पेन और जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों ने अपने यहां मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी है। ऐसे में अमेरिका की रणनीति और सहयोगी देशों के साथ संबंधों को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।
दुनिया भर में अमेरिका के 80 से अधिक देशों में 750 से ज्यादा सैन्य ठिकाने हैं, जिनमें से 55 देशों में 128 प्रमुख बेस शामिल हैं। यूरोप में ही अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डे मौजूद हैं, जहां बड़ी संख्या में सैनिक तैनात हैं। वहीं मध्य पूर्व में भी करीब 20 बेस सक्रिय हैं, जिनका उपयोग क्षेत्रीय गतिविधियों में किया जा रहा है।
मौजूदा हालात में अमेरिका अपने मध्य पूर्व स्थित नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहा है, जबकि जवाबी कार्रवाई में ईरान इन ठिकानों को निशाना बना सकता है। इसी वजह से कई यूरोपीय देश नहीं चाहते कि उनकी जमीन या हवाई क्षेत्र का उपयोग सैन्य हमलों के लिए किया जाए।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी नाटो देशों पर नाराजगी जता चुके हैं। उन्होंने कहा था कि अमेरिका के बिना नाटो कमजोर है और सहयोगी देश सैन्य कार्रवाई में साथ नहीं दे रहे हैं, जबकि तेल कीमतों को लेकर शिकायत कर रहे हैं।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच यह बयान वैश्विक कूटनीति और सैन्य रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है, जिससे आने वाले समय में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के रिश्तों में बदलाव देखने को मिल सकता है।









