100 साल जीकर क्या किया, ‘करोड़पति फकीर’ से सीखिए:स्कॉलरशिप और मदद से पढ़ाई कीं, अमेरिका में प्रोफेसर रहे; शिक्षा के लिए दान कर दी करोड़ों की कमाई

कभी फीस, किताबों और रहने-खाने के पैसे तक नहीं थे। गरीबी और संघर्ष देखा। लोगों की मदद और स्कॉलरशिप से पढ़ाई पूरी की। अमेरिका तक पहुंचे, गणित के प्रोफेसर बने। अब तक कमाई के 12 करोड़ रुपए बेटियों की पढ़ाई पर दान कर दिए।
आप जब यह खबर पढ़ रहे हैं, तब डॉ. घासीराम 100 साल के हो चुके हैं। फिजूल खर्च को रुपए का अपमान मानने वाले पैंट फटने पर रफू करवाकर पहन लेते हैं।
गरीबी में बीता बचपन, दूसरों की मदद ने बदली जिंदगी
डॉ. घासीराम वर्मा का जन्म 1 अगस्त 1926 को किसान चौधरी लादुराम के घर गांव सिगड़ी में हुआ। बचपन आर्थिक तंगी में बीता। पढ़ाई के दौरान कई बार फीस भरने, किताबें खरीदने और रहने-खाने तक के पैसे नहीं होते थे। पिलानी में नवलगढ़ ठिकाने के हेमसिंह राठौड़ की सिफारिश पर उन्हें एक स्कूल में एडमिशन मिला। ढाई रुपए हर महीने की छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) भी मिली। 1957 में पीएचडी तक की पढ़ाई छात्रवृत्तियों, सहपाठियों, समाजसेवियों और भामाशाहों की मदद से पूरी हुई।
अमेरिका जाने का मौका मिला, लेकिन पैसों की कमी फिर रास्ते में आ गई
डॉ. वर्मा खुद बताते हैं – जनवरी 1958 में इंडियन साइंस कांग्रेस, कलकत्ता में उनकी मुलाकात अमेरिकी गणितज्ञ प्रो. के.ओ. फ्रेडरिक्स से हुई। प्रो. फ्रेडरिक्स ने उन्हें अमेरिका आने का निमंत्रण दिया और पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप का अवसर भी दिलाया।
लेकिन उस समय अमेरिका जाने लिए रुपए नहीं थे। मदद मांगने पर बिड़ला एजुकेशन ट्रस्ट, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, विधायक सुमित्रा सिंह और उनके शिष्य विजयकुमार अड़ूकिया सहित कई लोगों ने आर्थिक सहयोग किया। आखिरकार 1 सितंबर 1958 को वे अमेरिका रवाना हुए और यहीं से उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ।
प्रोफेसर बने, परिवार बसाया और कमाई का बड़ा हिस्सा समाज के नाम किया
अमेरिका पहुंचने के बाद डॉ. वर्मा रोडे आइलैंड यूनिवर्सिटी के गणित विभाग में प्रोफेसर बने। रिटायरमेंट के बाद भी वे प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में जुड़े हुए हैं। उन्हें हर महीने डेढ़ लाख रुपए से अधिक पेंशन मिलती है और अमेरिका में बिजनेस से इनकम होती है। आज भी हर साल 20 से 30 लाख रुपए दान करते हैं। तीन बेटे डॉक्टर-इंजिनियर हैं, जो अमेरिका में ही रहते हैं। साथ ही अमेरिका में बिजनेस को भी संभालते हैं।
डॉ. वर्मा बताते हैं – करीब पांच पहले तक अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाते रहे और शोधार्थियों का मार्गदर्शन करते रहे। 2020 में लास्ट टाइम अमेरिका गए थे। अप्रैल 2022 में पत्नी रुक्मणी देवी के साथ वापस गांव लौट आए, तब गांव में ही है। साल 2025 में पत्नी की नेचुरल डेथ हो गई थी। अब चाचा-ताऊ के बेटे-बहु ही गांव में देखभाल करते हैं। घर में एक केयर टेकर रखा हुआ है।
1982 में छात्राओं की परेशानी देख दान की शुरुआत का फैसला किया
डॉ. वर्मा खुद बताते हैं – उस दौर में मिली हर छोटी मदद मेरे लिए काफी बड़ी थी। मन में ठान लिया था कि जब भी सक्षम होंगे, जरूरतमंदों की मदद जरूर करेंगे।
साल 1982 में अमेरिका से झुंझुनूं आए तो तेज धूप में दूर-दूर से पढ़ने आने वाली ग्रामीण छात्राओं की परेशानी देखी। खुद के संकट वाले दिन याद आए गए। उसी समय छात्रावास बनाने का फैसला किया। यहीं से उनकी दान करने की यात्रा शुरू हुई।
बाद में उनकी पहल से पहली बार 1984 में झुंझुनूं में महर्षि दयानंद स्कूल और बालिका छात्रावास (हॉस्टल) बना। जहां आज 300 से अधिक छात्राएं रहकर पढ़ाई करती हैं। इसी सोच से महिला साइंस कॉलेज भी स्थापित हुआ। इसके बाद उन्होंने कन्या शिक्षा को अपने जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य बना लिया।











