मानसून की सुस्ती से बदली खेती की रणनीति, किसानों को सीधे बुआई और कम अवधि वाली धान अपनाने की सलाह

प्रदेश में जुलाई की शुरुआत के साथ बारिश की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन कई जिलों में अब भी सामान्य से कम वर्षा और खंडवर्षा की स्थिति बनी हुई है। इसका असर खरीफ सीजन की बुआई पर साफ दिखाई दे रहा है। 48.69 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले अब तक केवल करीब पांच लाख हेक्टेयर यानी लगभग 10 प्रतिशत क्षेत्र में ही बुआई हो सकी है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई के पहले पखवाड़े तक पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो किसानों को खेती की रणनीति बदलनी होगी। ऐसी स्थिति में लंबी अवधि वाली धान की किस्मों के बजाय कम अवधि वाली किस्में और डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक अपनाना अधिक सुरक्षित और लाभकारी रहेगा।
कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश में खरीफ फसलों की बुआई का लक्ष्य 48.69 लाख हेक्टेयर रखा गया है। सामान्य तौर पर आषाढ़ माह तक धान की बुआई पूरी हो जाती है, लेकिन इस बार मानसून की अनियमित चाल के कारण कई क्षेत्रों में खेत अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं हो पाए हैं।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि देर से बुआई की स्थिति में 90 से 100 दिनों में तैयार होने वाली समलेश्वरी और दंतेश्वरी जैसी धान की किस्में बेहतर विकल्प हैं। वहीं 100 से 110 दिन में तैयार होने वाली आईआर-64, इंदिरा बारानी-1, इंदिरा बारानी-2 और सहभागी धान की खेती भी किसानों के लिए उपयुक्त मानी जा रही है।
उच्च भूमि वाले क्षेत्रों में किसानों को धान के बजाय दलहन और तिलहन की खेती करने की सलाह दी गई है। अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, तिल, रामतिल और सोयाबीन जैसी फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन दे सकती हैं। कतार पद्धति से बुआई करने पर नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण और पौधों की वृद्धि में भी लाभ मिलता है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यदि 15 जुलाई तक फसलों का अंकुरण नहीं होता है तो दोबारा बुआई के समय सामान्य से 10 प्रतिशत अधिक बीज का उपयोग करना चाहिए। साथ ही आवश्यकता अनुसार नैनो यूरिया या दो प्रतिशत यूरिया घोल का छिड़काव तथा दलहनी और तिलहनी फसलों में डीएपी का पर्णीय छिड़काव करने की भी सलाह दी गई है।
कृषि महाविद्यालय के विशेषज्ञों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में अब भी पर्याप्त पानी का ठहराव नहीं है, वहां कम अवधि वाली धान की किस्में जोखिम कम करेंगी। वहीं पानी की कमी वाले क्षेत्रों में दलहन और तिलहन की खेती किसानों के लिए अधिक लाभदायक साबित हो सकती है। किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि विभाग की सलाह लेकर ही फसल का चयन करने की अपील की गई है।











