तीन मूर्ति भवन को पीएम आवास बनाने का सपना, इंदिरा गांधी की इच्छा अटल बिहारी वाजपेयी ने क्यों नहीं होने दी पूरी?

देश की राजनीति से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा तीन मूर्ति भवन को लेकर सामने आता है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थीं कि दिल्ली स्थित तीन मूर्ति भवन को स्थायी रूप से प्रधानमंत्री आवास बनाया जाए. यह वही भवन था, जहां उन्होंने अपने पिता और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ करीब 16 साल बिताए थे.
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी इच्छा थी कि तीन मूर्ति भवन को आधिकारिक पीएम हाउस घोषित किया जाए. इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने उस समय विपक्ष में रहे अटल बिहारी वाजपेयी से इस संबंध में एक पत्र लिखने का अनुरोध किया था. इंदिरा गांधी ने भरोसा दिलाया था कि कैबिनेट की मंजूरी मिलते ही इस प्रस्ताव को लागू कर दिया जाएगा.
हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी ने पत्र लिखने से इनकार कर दिया. उन्होंने इंदिरा गांधी से कहा कि प्रधानमंत्री के रूप में ऐसा निर्णय लेने का अधिकार उन्हें स्वयं है और इसके लिए विपक्षी नेता के पत्र की आवश्यकता नहीं है. अटल बिहारी के इस रुख के बाद इंदिरा गांधी ने तीन मूर्ति भवन को प्रधानमंत्री आवास बनाने का विचार त्याग दिया.
इसके बाद वर्षों तक यह भवन नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के रूप में संचालित होता रहा. बाद में नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में इसे प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के रूप में विकसित किया गया, जहां देश के सभी प्रधानमंत्रियों के योगदान को प्रदर्शित किया गया है.
इस फैसले को लेकर कांग्रेस ने कड़ा विरोध जताया था. पार्टी नेताओं का कहना था कि इससे पंडित नेहरू की विरासत को कमतर करने की कोशिश की गई. वहीं सरकार का तर्क था कि यह कदम किसी एक नेता नहीं, बल्कि सभी प्रधानमंत्रियों के योगदान को सम्मान देने के लिए उठाया गया है.
राजनीतिक गलियारों में यह किस्सा आज भी चर्चा का विषय है कि कैसे इंदिरा गांधी की एक निजी इच्छा अटल बिहारी वाजपेयी के सिद्धांतवादी रुख के चलते इतिहास का हिस्सा बन गई.









