सिर्फ कॉलेजियम नहीं करती है जजों की नियुक्ति, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने बुधवार को कहा कि यह धारण गलत है कि सिर्फ जज ही जज को नियुक्त करते हैं. दत्ता ने कहा कि कॉलेजियम एक प्रणाली है, जो फैसला लेती है और उस फैसले को केंद्र सरकार के पास भेजा जाता है. केंद्र के अप्रूवल के बिना जजों को नियुक्त नहीं किया जा सकता है. अप्रूवल की भी एक लंबी प्रक्रिया है, जिसे सरकार भलीभांति जानती है.
लाइव लॉ के मुताबिक जस्टिस दीपांकर दत्ता ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधित मामले में फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की. दत्ता की इस टिप्पणी को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील से जोड़कर देखा जा रहा है. सुनवाई के दौरान मेहता ने कहा था कि जज ही जज को नियुक्त करते हैं, इसके बाद भी भारत में जजों को निष्पक्ष माना जाता है.
नियुक्ति में सरकार और खुफिया एजेंसी अहम
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि जजों की नियुक्ति मामले में भले ही कॉलेजियम नामों की सिफारिश करता है, लेकिन इसमें कार्यपालिका (यानी राज्य और केंद्र सरकार) की भी भूमिका अहम है. जस्टिस दत्ता ने आगे कहा कि खुफिया एजेंसी भी जजों की पात्रता को लेकर रिपोर्ट तैयार करती है. इसके बाद अप्रूवल मिलता है.
उन्होंने कहा कि कई मामलों में कॉलेजियम की सिफारिश को नहीं माना जाता है या उसे लटकाए रखा जाता है. इसके बावजूद कॉलेजियम कुछ नहीं कर पाती है. कॉलेजियम की कोशिश सिस्टम को ठीक से चलाने की है. ताकि कोई विवाद न हो.
जजों की नियुक्ति कैसे की जाती है?
कॉलेजियम के पास सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को नियुक्त करने का अधिकार है. इसके तहत कॉलेजियम तय नियमों के हिसाब से जजों के नामों की सिफारिश कानून मंत्रालय के पास भेजता है. इसके बाद कानून मंत्रालय राज्य और खुफिया एजेंसियों के जरिए जजों के बारे में जानकारी जुटाता है.
आखिर में जजों की नियुक्ति से संबंधित फाइल राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है. जस्टिस दत्ता का कहना है कि कॉलेजियम की कोशिश गलती न करने की होती है. हालांकि, यह सिस्टम इंसानों द्वारा संचालित हो रहा है, इसलिए कई बार गलती हो जाती है.
अब जानिए कॉलेजियम सिस्टम क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और 4 सीनियर जस्टिस की एक टीम को कॉलेजियम कहा जाता है. इसका काम जजों की नियुक्ति, पदोन्नति और जजों से जुड़े उन मामलों को सुलझाना जो जरूरी है. कॉलेजियम के पास जजों को ट्रांसफर करने का अधिकार है. कॉलेजियम की सिफारिश पर ही हाई कोर्ट के जजों को किसी केस से हटाया जाता है.











