सुप्रीम कोर्ट ने फैसलों में देरी को बताया न्याय की बाधा, कहा इसे खत्म किया जाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों द्वारा फैसलों को महीनों तक सुरक्षित रखे जाने की प्रथा को ‘चिह्नित बीमारी’ बताया और कहा कि यह न्याय में बाधा डालती है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रथा को खत्म किया जाना चाहिए और वह हाईकोर्ट के जजों के साथ आगामी बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने झारखंड हाईकोर्ट के एक मामले का उदाहरण दिया, जिसमें दिसंबर 2025 में मौखिक रूप से सुनाया गया फैसला अब तक अपलोड नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगले सप्ताह तक वकील को पूरा फैसला उपलब्ध कराया जाए।

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि न्यायाधीशों में दो तरह होते हैं, एक मेहनती होते हैं जो मामलों को सुरक्षित रखते हैं और समय पर सुनाते हैं, जबकि कुछ न्यायाधीश फैसले लंबित छोड़ देते हैं। उन्होंने कहा कि यह न्यायपालिका के सामने चुनौती है और इसका इलाज होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि कुछ मामलों में दलीलें सुनने के बाद उन्हें आगे निर्देशों के लिए सूचीबद्ध कर दिया जाता है, जिसे भी रोका जाना चाहिए। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के जजों के साथ बैठक में इस पर समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी, ताकि टाले जाने वाले मुकदमे समय पर निपटें।

सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में सभी उच्च न्यायालयों को सुरक्षित रखे गए फैसलों का विवरण सौंपने का निर्देश दिया था, जिसमें सुनाने और अपलोड करने की तारीखें शामिल थीं। कोर्ट इस निर्देश के पालन की निगरानी कर रहा है और सुनिश्चित कर रहा है कि फैसलों की सभी प्रमाणित प्रतियों में ये तारीखें दर्ज हों।

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