चार निलंबन से नहीं छुपेगा सच! धान खरीदी घोटाले में सहकारी बैंक से लेकर SDM तक पर उठे गंभीर सवाल

सूरजपुर: धान खरीदी वर्ष 2025–26 में सूरजपुर जिला अब एक बड़े प्रशासनिक और वित्तीय घोटाले की तस्वीर पेश कर रहा है. आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं कि गड़बड़ी महज कुछ समिति प्रभारियों की नहीं, बल्कि सहकारी बैंक, नोडल अधिकारी और प्रशासनिक निगरानी तंत्र की सामूहिक विफलता का परिणाम है. जिले के 54 धान खरीदी केंद्रों में से करीब 8 केंद्रों पर धान शार्टेज सामने आना, कुल 37 लाख 33 हजार 368 क्विंटल खरीदी के बावजूद केवल 40 प्रतिशत उठाव होना और करीब 28 लाख 60 हजार 288 क्विंटल धान का खुले आसमान के नीचे पड़ा रहना पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.

जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित, सूरजपुर द्वारा चार समिति प्रभारियों को निलंबित करना और एक पर एफआईआर दर्ज कराना यह स्वीकार करता है कि गड़बड़ी गंभीर है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने बड़े खेल में सिर्फ समिति प्रबंधक ही जिम्मेदार हो सकते हैं? जब समिति प्रभारियों की नियुक्ति बैंक की सिफारिश पर होती है, भुगतान बैंक के माध्यम से होता है और पूरी खरीदी प्रक्रिया की निगरानी नोडल अधिकारी, तहसीलदार, एसडीएम और खाद्य विभाग करते हैं, तो फिर जिम्मेदारी का दायरा यहीं खत्म कैसे हो गया?

हमर उत्थान सेवा समिति ने इस कार्रवाई को अधूरी बताते हुए सीधे तौर पर सहकारी बैंक प्रबंधक, नोडल अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं. समिति का कहना है कि बैंक का काम सिर्फ किसानों को पैसा देना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है कि भुगतान वास्तविक किसान, वास्तविक धान और वास्तविक मात्रा के आधार पर हो. यदि फर्जी किसानों के नाम पर भुगतान हुआ या कागजों में धान दिखाकर जमीन पर वह मौजूद नहीं है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी बैंक प्रबंधन और नोडल अधिकारियों की बनती है.

समिति का आरोप है कि बिना भौतिक सत्यापन के भुगतान, रिकॉर्ड का औपचारिक मिलान और निरीक्षण में लापरवाही के कारण ही यह स्थिति बनी. यदि समय रहते किसान सूची, उठाव रिपोर्ट और भंडारण की वास्तविक स्थिति की जांच की गई होती, तो लाखों क्विंटल धान खुले में सड़ने और शार्टेज जैसी गंभीर अनियमितता सामने ही नहीं आती.

हमर उत्थान सेवा समिति ने मांग की है कि सहकारी बैंक द्वारा किए गए सभी भुगतानों की किसानवार सूची सार्वजनिक की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि भुगतान किन किसानों को, कितनी मात्रा के लिए और किस आधार पर किया गया. साथ ही जिन केंद्रों पर शार्टेज सामने आई है, वहां समिति प्रभारियों के साथ-साथ सहकारी बैंक प्रबंधक, नोडल अधिकारी, तहसीलदार, एसडीएम और खाद्य विभाग के जिम्मेदार अफसरों पर भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए.

समिति का स्पष्ट कहना है कि यदि कार्रवाई केवल निलंबन और एक एफआईआर तक सीमित रही, तो यह किसानों के साथ अन्याय और शासन की नीयत पर सवाल होगा. धान खरीदी व्यवस्था में भरोसा तभी लौटेगा, जब छोटे कर्मचारियों के साथ-साथ बड़े पदों पर बैठे जिम्मेदारों की भी जवाबदेही तय की जाएगी.
अब सवाल यह नहीं कि धान कहां गया, बल्कि सवाल यह है कि किसके संरक्षण में गया—और इसका जवाब पूरे जिले को चाहिए.

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