क्या धरती रहने लायक नहीं बची है? नई रिपोर्ट में 9 में से 7 प्राकृतिक सीमाएं खतरे के पार

सोचिए, अगर धरती एक घर है और उस घर में रहते हुए दीवारों पर आपको कई बत्तियां दिख रही हैं. ऐसे लाल बत्तियां जो खतरे का संकेत देती हैं. यह सब अपनी आंखों से देखकर आप कैसा महसूस करेंगे? असल में अभी धरती के साथ ऐसा ही हो रहा है. कहीं तापमान बढ़ रहा है, कहीं जंगल और जैव विविधता घट रही है, कहीं नदियों और भूजल पर दबाव बढ़ रहा है, तो कहीं समुद्र का पानी अपनी केमिस्ट्री बदल रहा है. अब वैज्ञानिकों की नई रिपोर्ट ने इस तस्वीर को और गंभीर बना दिया है. इसे धरती की हेल्थ चेकअप रिपोर्ट कहें, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. इस रिपोर्ट ने बताया है कि अर्थ के हेल्थ के पैरामीटर गड़बड़ा रहे हैं. उसकी सेहत फिलहाल डेंजर जोन में हैं.

जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च यानी PIK की प्लैनेटरी बाउंड्रीज साइंस लैब की 2026 की प्लैनेटरी हेल्थ चेक रिपोर्ट के मुताबिक, धरती की 9 में से 7 प्लैनेटरी बाउंड्री यानी ऐसी सीमाएं, जिनके भीतर पृथ्वी का सिस्टम इंसानों के लिए सुरक्षित माना जाता है, अब अपनी सुरक्षित सीमा पार कर चुकी हैं.

खास बात यह है कि जिन 7 सीमाओं का उल्लंघन हुआ है, उनमें से सभी की स्थिति बिगड़ने की तरफ है. इनमें 4 सीमाएं हाई रिस्क जोन में पहुंच चुकी हैं, जबकि बाकी 3 बढ़ते जोखिम वाले क्षेत्र में हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर यह ट्रेंड जारी रहा तो पृथ्वी के जीवन को सहारा देने वाले सिस्टम में बड़े और कुछ मामलों में वापस न लौट पाने वाले बदलाव हो सकते हैं.

9 में से 7 सीमाएं पार, कौन-कौन सी हैं खतरे में?

रिपोर्ट में जिन 7 प्लैनेटरी बाउंड्री के सुरक्षित दायरे से बाहर जाने की बात कही गई है, उनमें जलवायु परिवर्तन, बायोस्फियर यानी जीवमंडल की अखंडता में बदलाव, बायोकेमिकल फ्लो में बदलाव, नए केमिकल और मानव निर्मित पदार्थों का फैलाव, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव, मीठे पानी में बदलाव और समुद्र के अम्लीकरण शामिल हैं.

इनमें जलवायु परिवर्तन, जीवमंडल की अखंडता, बायोकेमिकल फ्लो और नए मानव निर्मित पदार्थों से जुड़ी सीमा हाई रिस्क जोन में है. वहीं, जमीन के इस्तेमाल, मीठे पानी और समुद्र के अम्लीकरण से जुड़ी सीमाएं बढ़ते जोखिम वाले क्षेत्र में पहुंच गई हैं.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन सीमाओं को अलग-अलग संकट की तरह नहीं देखा जा सकता. पृथ्वी का क्लाइमेट, पानी, जमीन, जंगल, महासागर और जैव विविधता आपस में जुड़े हैं. एक सिस्टम पर बढ़ता दबाव दूसरे सिस्टम को भी प्रभावित कर सकता है.

धरती के सुरक्षित दायरे का मतलब क्या है?

पृथ्वी पर करीब 11,700 साल तक होलोसीन युग रहा. इस दौरान जलवायु अपेक्षाकृत स्थिर रही, मीठे पानी और पोषक तत्वों के चक्र ने खेती को सहारा दिया और प्राकृतिक इकोसिस्टम ने इंसानी जीवन के लिए जरूरी भोजन, पानी और संसाधन उपलब्ध कराए.

इसी दौर में इंसानों ने खेती से लेकर शहरों और आधुनिक सभ्यता तक का विकास किया. वैज्ञानिकों ने इसी स्थिरता को आधार बनाकर यह समझने की कोशिश की कि पृथ्वी किन सीमाओं के भीतर इंसानों के लिए सुरक्षित रह सकती है.

लेकिन 20वीं सदी के मध्य से आबादी, ऊर्जा की खपत, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन, फर्टिलाइजर का इस्तेमाल, जमीन का इस्तेमाल, पानी की खपत, ट्रांसपोर्ट और संसाधनों की खपत तेजी से बढ़ी. इसके साथ पृथ्वी के अलग-अलग सिस्टम पर दबाव भी बढ़ता गया.

रिपोर्ट में हर प्लैनेटरी बाउंड्री की स्थिति को एक या दो कंट्रोल वेरिएबल से मापा जाता है. कुल मिलाकर 9 बाउंड्री के लिए 13 ऐसे कंट्रोल वेरिएबल इस्तेमाल किए जाते हैं.

क्लाइमेट से लेकर बायोडायवर्सिटी तक, सबसे ज्यादा दबाव कहां?

जलवायु परिवर्तन उन सीमाओं में शामिल है जहां हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं. इसे मुख्य रूप से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा और ग्रीनहाउस गैसों से पैदा होने वाले रेडिएटिव फोर्सिंग के जरिए मापा जाता है.

इसका असर बढ़ते तापमान, एक्सट्रीम वेदर, इकोसिस्टम को नुकसान, समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी और स्वास्थ्य, भोजन, पानी और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते जोखिम के रूप में दिखाई दे रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, तापमान बढ़ने के साथ ऐसे बदलावों का खतरा भी बढ़ता है जो लंबे समय तक या स्थायी हो सकते हैं.

दूसरी बड़ी चिंता बायोस्फियर की अखंडता को लेकर है. इसके तहत प्रजातियों के विलुप्त होने की दर और इंसानों की ओर से प्राकृतिक वनस्पति उत्पादकता के इस्तेमाल को देखा जाता है. दोनों ही कंट्रोल वेरिएबल हाई रिस्क जोन में हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इसमें और गिरावट आती है तो कार्बन, पानी, पोषक तत्व, मिट्टी और जलवायु को नियंत्रित करने की प्रकृति की क्षमता कमजोर हो सकती है. इसका असर खाद्य सुरक्षा, साफ पानी, आजीविका और इकोसिस्टम की क्षमता पर पड़ सकता है.

2 सीमाएं अभी सुरक्षित, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं

रिपोर्ट में 2 प्लैनेटरी बाउंड्री अभी सुरक्षित दायरे में बताई गई हैं. इनमें वायुमंडलीय एरोसोल और स्ट्रैटोस्फेरिक ओजोन का क्षरण शामिल है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इन दोनों क्षेत्रों में सब कुछ ठीक है. दक्षिण एशिया जैसे कुछ इलाकों में वातावरण में एरोसोल का स्तर बढ़ा है. ओजोन लेयर की रिकवरी भी धीमी हुई है और इसका स्तर अभी 20वीं सदी के मध्य के स्तर से नीचे है. यही ओजोन लेयर सूर्य से आने वाली हानिकारक अल्ट्रावायलेट रेडिएशन से पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है.

रिपोर्ट ने तीन बड़े जोखिमों को भी खास तौर पर सामने रखा है. इनमें जमीन में मौजूद कार्बन को स्टोर करने की क्षमता का कमजोर होना, समुद्र तल के स्वास्थ्य पर दबाव और मानव निर्मित केमिकल्स व मटेरियल से पैदा होने वाले ऐसे जोखिम शामिल हैं जिनके असर का पता व्यापक नुकसान होने के बाद चल सकता है. रिपोर्ट के प्रमुख लेखक बोरिस साक्शेवस्की के मुताबिक, सुरक्षित दायरे से बाहर जा चुकी हर प्लैनेटरी बाउंड्री पर दबाव बढ़ रहा है. इसका मतलब है कि बड़े पैमाने पर और संभावित रूप से स्थायी बदलाव का खतरा बढ़ रहा है, जबकि इन समस्याओं से निपटने की गुंजाइश लगातार कम हो रही है.

PIK ने इस स्थिति को समझाने के लिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सामने आए घटनाक्रमों का भी जिक्र किया है. इनमें पाकिस्तान की 2025 की मानसून बाढ़, 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा ग्लोबल ओशन हीट कंटेंट और 2023 से सितंबर 2025 के बीच दुनिया के करीब 84.4 प्रतिशत कोरल रीफ एरिया को प्रभावित करने वाला ग्लोबल कोरल ब्लीचिंग शामिल है. यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि धरती रहने लायक बची है या नहीं. असली सवाल यह है कि इंसानों के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली पृथ्वी की सीमाओं को हम कितनी जल्दी फिर से सुरक्षित दायरे में ला सकते हैं.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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