565 रियासतों का पटेल ने कैसे कराया था भारत में विलय? कुछ राज्यों के आगे रहने की दास्तां

1947 में जब भारत आजाद हुआ, तब ऐसा नहीं था कि एक ही देश ने एक सुबह आंखें खोलीं. उस समय भारत के भीतर सैकड़ों छोटी-छोटी रियासतें और अलग-अलग इलाके थे, जो अपनी-अपनी दुनिया में जी रहे थे. आज जिस भारत को हम एक देश के रूप में जानते हैं, वह उस समय एक जैसी जगह नहीं था. वह सैकड़ों अलग-अलग हिस्सों से मिलकर बना था. उस समय भारत में 565 रियासतें थीं और हर रियासत का अपना राजा या रानी थी, अपने नियम थे, अपनी व्यवस्था थी और अपने तरीके से काम करने की आजादी थी. ये रियासतें मिलकर भारत की लगभग आधी जमीन पर फैली हुई थीं. इनमें से कोई भी ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थी. अपने छोटे-से संसार में वो अलग थीं, जैसे एक-दूसरे के पास बैठी 565 छोटी-छोटी दुनिया.
आजादी के बाद अगले दो सालों में सरदार पटेल ने अधिकारी वी. पी. मेनन की मदद से इन सभी रियासतों को एक भारत में लाने का कठिन काम किया. यह आसान नहीं था. हर राजा को अलग-अलग समझाना पड़ा. कहीं प्यार और समझाने की भाषा काम आई, तो कहीं सख्ती भी दिखानी पड़ी. कुछ राजाओं ने कुछ ही दिनों में भारत के साथ आने का फैसला कर लिया. त्रावणकोर नाम की एक रियासत ने कुछ समय के लिए कहा कि वह स्वतंत्र रहना चाहती है, लेकिन बाद में उसने अपना फैसला बदल दिया और भारत में शामिल हो गई.
पाकिस्तान में जाना चाहता था जूनागढ़
जूनागढ़ ने पाकिस्तान के साथ जाने की कोशिश की, जबकि वहां की बड़ी आबादी हिंदू थी. बाद में वह फैसला बदल गया. हैदराबाद, जो उस समय सबसे अमीर और सबसे जिद्दी रियासतों में से एक था, लंबे समय तक भारत में शामिल होने को तैयार नहीं हुआ. आखिरकार 1948 में भारतीय सेना को वहां जाना पड़ा.
साल 1950 तक लगभग सभी 565 रियासतें भारत का हिस्सा बन चुकी थीं, लेकिन इस कहानी का एक हिस्सा ऐसा है, जो आज भी हमारे जीवन को प्रभावित करता है. भारत में शामिल हो जाने से यह मिट नहीं गया कि आजादी से पहले हर रियासत ने अपने लोगों के लिए क्या किया था और क्या नहीं किया था. हर जगह की शुरुआत एक जैसी नहीं थी.
केरल के शासकों ने शिक्षा को दिया महत्व
केरल को देखिए. आज का केरल जिस पुराने राज्य से बना, उसका नाम तब त्रावणकोर था. आजादी से बहुत पहले वहां शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए काम शुरू हो चुका था. वहां के शासकों ने शिक्षा को महत्व दिया था, उस समय जब देश के बहुत बड़े हिस्से में शिक्षा अभी आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा नहीं बनी थी. लड़कियों की शिक्षा भी वहां कई दूसरे इलाकों से बहुत पहले शुरू हो गई थी. जब त्रावणकोर भारत का हिस्सा बना और आगे चलकर केरल बना, तब वह पुरानी शुरुआत खत्म नहीं हुई. वह केरल के लिए एक शुरुआती बढ़त बन गई.
हर रियासत की अलग कहानी
दूसरी रियासतों में कहानी अलग थी. किसी राजा ने दूसरी चीजों को ज्यादा महत्व दिया. किसी राजा के पास कम साधन थे, इसलिए वहां कम स्कूल बने और जिन इलाकों पर सीधे अंग्रेजों का शासन था, वहां भी स्थिति हर जगह एक जैसी नहीं थी. अंग्रेजों की प्राथमिकता स्थानीय बच्चों के लिए स्कूल बनाना नहीं, बल्कि राजस्व जुटाना और सामान को बंदरगाहों तक पहुंचाना अधिक थी.
इसलिए जब 1950 में ये सारे अलग-अलग हिस्से मिलकर भारत बने, तब वो एक ही जगह से शुरू नहीं कर रहे थे. कुछ राज्य पहले से आगे थे. कुछ राज्य पहले से पीछे थे और यह अंतर उन लोगों की वजह से नहीं था, जो बाद में वहां पैदा हुए. यह उन फैसलों का परिणाम था, जो उनसे कई साल पहले उनके शासकों और व्यवस्थाओं ने लिए थे. आज जो लोग इन राज्यों में रहते हैं, उनका उन पुराने फैसलों में कोई हाथ नहीं था.
कई राज्यों को दशकों तक करनी पड़ी मेहनत
आज भी भारत में यह पुरानी कहानी दिखाई देती है. जिन राज्यों ने शिक्षा और स्वास्थ्य में पहले से कुछ बढ़त बना ली थी, जैसे केरल, वो काफी हद तक आगे बने रहे. जिन राज्यों ने पीछे से शुरुआत की, उन्हें आगे आने के लिए कई दशकों तक मेहनत करनी पड़ी. उनके सामने वह कमी पहले से मौजूद थी, जब भारत का संविधान भी नहीं बना था.
इसका यह मतलब नहीं है कि आज राज्यों के बीच जो अंतर है, उसकी पूरी वजह केवल इतिहास है. 1950 के बाद हर राज्य की सरकार ने अपने फैसले लिए. कुछ फैसले अच्छे रहे, कुछ अच्छे नहीं रहे. उन फैसलों का भी आज के भारत पर बहुत असर है, लेकिन यह बात याद रखना जरूरी है कि भारत के सभी राज्यों ने अपनी यात्रा एक ही जगह से शुरू नहीं की थी. किसी के पास शुरुआत से ही कुछ कदम आगे रहने की सुविधा थी और किसी को शुरुआत से ही कुछ कदम पीछे से चलना पड़ा.
इसलिए अगली बार जब हम एक भारतीय राज्य की तुलना दूसरे भारतीय राज्य से करें, तो एक शांत सवाल पहले पूछना चाहिए. सिर्फ यह नहीं कि यह राज्य आज कितनी दूर पहुंच गया है, यह भी पूछना चाहिए कि उसकी कहानी की शुरुआत आखिर कितनी दूर पीछे से हुई थी.
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