स्लीपर बस में सफर, टिकट सस्ता, लेकिन सुरक्षा कितनी?

Greater Noida Bus Fire on Yamuna Expressway: रात का सफर था, लोग बेफिक्र सो रहे थे, अचानक बदबू आई, धुआं उठा और बस देखते ही देखते आग की लपटों में बदल गई. 24 सितंबर 2026 की रात ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे पर दिल्ली से महोबा जा रही एक स्लीपर बस में आग लगने की घटना अपनी तरह की अकेली इकलौती घटना नहीं है. इस बस में करीब 50 लोग सवार थे. कईयों को बाहर निकलने का मौका नहीं मिला. कुछ ने बचने के लिए बस से छलांग लगाई. लेकिन 9 लोग इस हादसे की भेंट चढ़ गए.

हादसे के बाद उठे सवाल

जिस स्लीपर बस को लोग ट्रेन से सस्ती मानकर बुक कर लेते हैं. क्या वो उतनी सेफ भी है क्योंकि पिछले आंकड़े भी डर पैदा करते हैं. सरकार ने संसद में जो आंकड़े दिए हैं, उनके हिसाब से साल 2023 से दिसंबर 2025 तक बसों में आग लगने की 45 घटनाओं में 64 लोगों की मौत हुई थी. मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवेज के ई-डीएआर यानी डीटेल्ड एक्सीडेंटल रिपोर्ट के पोर्टल में अप्रैल 2023 से मार्च 2026 के बीच सभी तरह की बसों में आग की 98 घटनाएं ई-डीएआर पोर्टल पर दर्ज हुईं.

क्यों लगती है स्लीपर बसों में आग?

  1. वायरिंग और एसी का लोड: एक्सपर्ट्स कहते हैं कि कई गैर-फैक्ट्री निर्मित स्लीपर बसों में बाद में एसी, लाइटिंग और चार्जिंग पॉइंट लगाए जाते हैं. लगातार कई घंटे चलने पर इलेक्ट्रिकल लोड बढ़ता है. वायरिंग गर्म होने या खराबी आने पर आग तेजी से फैल सकती है.
  2. बस का डिजाइन: स्लीपर बस में सीट नहीं बर्थ होती है. रास्ता संकरा होता है. बर्थ ऊपर-नीचे होती हैं. आग लगने पर या धुआं होने पर सो रहे पैसेंजर को जगाने और बाहर निकालने में समय लगता है जो क्रूशियल होता है.

सरकार ने साल 2026 में जिन पुरानी स्लीपर बस हादसों की जांच की, उनमें इमरजेंसी एक्जिट छोटा होने, रास्ते में रुकावट, रूफ हैच और फायर डिटेक्शन-सप्रेशन सिस्टम की कमियां पाई गई थी.

मॉडिफिकेशन- सरकार के मुताबिक, 6 फरवरी 2026 तक देश में 49,616 रजिस्टर्ड स्लीपर कोच थे जबकि 886 बस बॉडी बिल्डर्स मान्यता प्राप्त थे. ये बहुत बड़ा और तेजी से बढ़ता ट्रांसपोर्ट सेगमेंट है.

टिकट कितना सस्ता है?

जिस बस में आग लगी उस बस में दिल्ली से महोबा का किराया 549 से 1,699 रुपये तक है. कम पैसों में लंबी दूरी का रातभर का सफर लोगों के लिए अच्छा ऑप्शन है इसलिए सुरक्षा को बस महंगी बसों तक सीमित नहीं किया जा सकता.

क्या है हल?

सरकारी नियमों में स्लीपर बसों के लिए एआईएस-052 और एआईएस-119 जैसे सिक्योरिटी स्टैंडर्ड हैं.

  • एआईएस (AIS-052): बस बॉडी डिजाइन के लिए आचार संहिता एक ऐसा नियम है. जो बसों के निर्माण के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है और बैठे और खड़े यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है. यह देश में बनने वाली सभी प्रकार की बसों (जैसे बैठने वाली यात्री बसें, मिनी बसें और स्टैंडर्ड बसें) के निर्माण, ढांचे, आपातकालीन दरवाजों, खिड़कियों और आयामों (dimensions) के लिए बुनियादी नियम तय करता है, जिसमें इमरजेंसी एग्जिट, फायर एक्सटिंग्विशर और फायर डिटेक्शन-सप्रेशन होना जरूरी है.
  • एआईएस-119 (AIS-119): यह विशेष रूप से स्लीपर कोच बसों के लिए बनाया गया सुरक्षा और प्रमाणन मानक है, जो एआईएस-052 के अंतर्गत ही काम करता है, लेकिन स्लीपर बसों के लिए इसमें अतिरिक्त व विशिष्ट प्रावधान जोड़े गए हैं. इसके तहत बर्थ का आकार (लंबाई-चौड़ाई), गलियारे (gangway) की चौड़ाई, आग से सुरक्षा (fire safety) और स्लीपर लेआउट से जुड़े कड़े नियम तय किए जाते हैं. लेकिन बात नियम होने की नहीं नियम लागू होने की है.

इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग के सीनियर फेलो एवं कोऑर्डिनेटर एसपी सिंह कहते हैं- स्लीपर बस में आग लगने पर असली चुनौती आग से ज्यादा यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने की होती है. इमरजेंसी एग्जिट, रूफ हैच, फायर डिटेक्शन-सप्रेशन सिस्टम और फायर-रिटार्डेंट मटेरियल की जांच सिर्फ कागजों पर नहीं, बस की वास्तविक स्थिति देखकर होनी चाहिए.

बस की फिटनेस पेपर पर नहीं रोड पर चेक होना जरूरी है. वायरिंग, एसी सिस्टम, इमरजेंसी एग्जिट, रूफ हैच, फायर सिस्टम और बर्थ के बीच इमरजेंसी में निकलने की कितनी जगह है ये जांचना जरूरी है.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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