आया लेट और भागा जल्दी… दगाबाज मानसून से मुश्किल में फंसेगी दिल्ली!

बस दस सितंबर तक थोड़ी-बहुत बारिश दिल्ली में हुई. इसके बाद कुछ दिन आसमान पर छाए बादल बारिश का इशारा करते रहे, लेकिन 14 सितंबर के बाद बादल भी दिल्ली के आसमान से गायब होते गए. एकाएक पारा तीन से पांच डिग्री तक बढ़ने लगा. रात भी गर्म होने लगी. फिर भी मौसम विज्ञानी 25 सितंबर तक बारिश की दिलासा दिलाते रहे. अंत में बुधवार 23 सितंबर को उन्होंने भी भविष्यवाणी कर दी कि बस अब दिल्ली में बारिश का सीजन खत्म. यह दिल्ली वालों के लिए तगड़ा झटका था क्योंकि बढ़ता पारा और आसपास के राज्यों में जलाई जाने वाली पराली का धुआं दिल्ली के आसमान पर रंग दिखाने लगा. प्रदूषण का सूचकांक 200 पार कर गया. किंतु बदल दिल्ली से 500 किमी की दूरी तक बरस कर लौट गए. दक्षिण पश्चिम मानसून इस बार दिल्ली-एनसीआर के लिए तो बहुत निराशाजनक रहा.
कुल 83 दिन का मानसून
इस वर्ष मानसून की अवधि कुल 83 दिनों की रही. दिल्ली के आसमान पर दो जुलाई को बादल घिरे थे. तब मौसम वैज्ञानिकों ने कहा था, देर से सही लेकिन मानसून लंबा टिकेगा. पर वह तो तय अवधि के पहले ही विदा हो लिया. अभी तक 1971 से ले कर 2019 की अवधि के बीच देखा गया है कि साउथ वेस्ट मानसून दिल्ली से 25 सितंबर तक विदा लेता है. पर इस बार तो वह 23 को ही चला गया. उसमें भी 10 सितंबर के बाद तो शायद ही दिल्ली एनसीआर में कहीं पानी गिरा. हालांकि देश का मौसम विज्ञान विभाग (IMD) कह रहा है कि इस साल 728.6 मिमी बारिश हुई, जो एक रिकॉर्ड है. जबकि सामान्यतया यहां 629.75 मिमी वर्षा होती रही है. आईएमडी का कहना है कि दिल्ली में इस बार 16 प्रतीश अधिक बारिश हुई. मौसम विभाग आंकड़ों से खेलता है, लेकिन बारिश यदि मौसम और कृषि के अनुकूल न हो तो अधिक वर्षा भी व्यर्थ.
हवा की गति धीमी होने से प्रदूषण बढ़ने की आशंका
मानसून विभाग की मानें तो 1961 से अब तक सिर्फ 1982 में मानसून ने सबसे जल्दी विदाई ली थी. उस वर्ष मानसून दो सितंबर को ही लुप्त हो गया था, जबकि 2013 में दक्षिण पश्चिम मानसून ने 17 अक्टूबर तक डेरा डाला था. उस वर्ष त्योहारी सीजन में व्यापारियों को अपना माल निकलवाने में बहुत दिक्कतें आई थीं क्योंकि दशहरा भी भीगते हुए गुजरा था. अब इस बार गर्म दिन बढ़ेंगे लेकिन रातें ठंडी होने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे. हालांकि मौसम विभाग रातें ठंडी होने की सूचनाएं जारी कर रहा है. किंतु हवाओं की गति से ऐसा होता नहीं लग रहा है. हवा ऐसी ही धीमी गति से बही तो आने वाले दिनों में प्रदूषण और बढ़ेगा, लेकिन इसका असर आने वाली त्योहारी सीजन पर दिखेगा क्योंकि वर्षा के दिन कम होना और अति वृष्टि तथा अति सूखा भारतीय कृषि के लिए बहुत निराशाजनक होती है.
त्योहारी सीजन में उदासी!
अभी तक की जो स्थिति है, उसमें खरीफ की फसल के अच्छी होने की उम्मीद बहुत कम है. सब्जियों के दाम बढ़ने का संकेत यही है कि मौसम की चाल कृषि उपजों के अनुरूप नहीं रही, पर असली संकट दलहन और खरीफ में पैदा होने वाले अनाजों (जैसे धान, मक्का, बाजरा, ज्वार) को ले कर है. उड़द, मूंग, मसूर आदि पर महंगाई की मार पड़ेगी. भारत के बाजार भी उपज पर निर्भर करते हैं क्योंकि भारत का सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग किसान के पास ही जब उपज का पैसा नहीं आयेगा तो वह खरीदेगा क्या! सितंबर और अक्टूबर भारत में पूजा फेस्टिवल के तौर पर विख्यात है. छुट्टियां भी इसी मौसम में होती थीं. शनिवार 26 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो जाएंगे और 10 अक्टूबर से नवरात्रि शुरू. इसी के साथ भारत में त्योहारी सीजन भी प्रारंभ हो जाएगा जो दशहरा, दीवाली, गुरु नानक जयंती होते हुए क्रिसमस तक तथा एक जनवरी 2027 तक रहेगा.
वर्षा से तय होती है खुशहाली
भारत के सारे त्योहार, पर्व धन-धान्य से जुड़े हैं. जब फसल पकी, कटी और आनाज घर आया तो खुशियां भी आईं. और यही त्योहार का उल्लास है. लोग भी फुरसत में होते हैं, मिलना-जुलना होता है. इसी के साथ खुशियां सब को बांटी जाती हैं. परिवार में ही नहीं बल्कि किसानी समाज की उस परजा को भी जो किसान के लिए सहायक होते हैं. इसीलिए भारतीय ग्राम्य व्यवस्था में किसान को राजा माना गया है. बाकी पेशेवर समुदाय के लोग, पुरोहित भी, परजा है. अर्थात् जिनकी भूमिका सहायक की है और जो उत्पादन कार्यों से सीधे नहीं जुड़े हैं वे सब परजा हैं. परंतु राजा यानी किसान की खुशहाली तब ही है जब उसकी उम्मीद के मुताबिक वर्षा हो. किसान के लिए यूं तो सभी मौसम का अपना महत्व है, पर वर्षा का कुछ ज्यादा ही क्योंकि वर्षा ही उसकी खुशहाली को तय करती है.
सितंबर का स्वागत
यदि वर्षा उसकी कृषि के अनुरूप हो. यानी जून ज़मीन को भिगो कर जाए और सितंबर जाड़े की शुरुआत कर जाए तब ही वर्षा का आनद है. खूब प्रखर धूप, दांत किटकिटाने वाला जाड़ा और फसलों को जब जरूरत हो, उसके मुताबिक वर्षा, किसान की समृद्धि को ले कर आते हैं. लेकिन इनमें से किसी का क्रम बिगड़ जाए तो उसकी फ़सल कमज़ोर पड़ने लगती है. फसल की कमजोरी सिर्फ किसान के ही चेहरे पर नहीं दीखती बल्कि समस्त व्यापारी समुदाय के चेहरों को भी मुरझा देती है. इसीलिए ग्रेगेरियन कैलेंडर में सितंबर और विक्रमी संवत् गणना में क्वार का महीना बहुत खुशगवार कहा गया है. किंतु एक बात भारत में जरूरी है और वह यह कि सितंबर के पहले दो महीनों में खुल कर बारिश हो जाए तब ही सितंबर ख़ुशी का महीना होगा. बारिश हुई तो कृषि खिली और कृषि खिली तो किसान ख़ुश हुआ, व्यापारी प्रसन्न हुआ और नौकरी-पेशा वर्ग भी.
ग्लोबल वार्मिंग में सितंबर की दुर्गति
यूं पूरी दुनिया में सितम्बर को खुशगवार मौसम माना जाता रहा है. लेकिन ग्लोबल वार्मिंग ने इसकी ऐसी दुर्गति की कि वही सितम्बर अब परेशानी का सबब बनता जा रहा है. बढ़ता पारा और बारिश के पानी की सही निकासी नहीं होने से मच्छर पनपते जो बीमारियां बढ़ाते हैं. पर इस बार ऐसा नहीं हुआ तो इसकी वज़ह शायद स्वच्छता अभियान की पहल भी रही. हमारी परम्परा में सितंबर महीने को शरद ऋतु के आगमन का महीना माना गया है. कहा गया है कि वर्षा विगत शरद ऋतु आई और चूंकि वर्षा अगस्त से समाप्त मान ली जाती है. इसलिए सितम्बर से शरद शुरू. माना गया है कि जैसे ही कांस फूलता है वैसे वर्षा को समाप्तप्राय मान लिया जाता है. किंतु वर्षा किसान की इच्छाओं के अनुरूप नहीं हुई और कांस ने फूल कर बादलों की विदाई तय कर दी. लोक कवि घाघ ने लिखा है, उगे अगस्त फूले कास, अब छोड़ो वर्षा की आस! इस वर्ष अगस्त नक्षत्र (कैनोपस) का उदय तो 4 सितंबर को ही हो गया था.
अगस्त नक्षत्र तो चार को ही उदय हो गया था
तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है, फूले कास सकल महि छायी, जनु बरखा कृत प्रकट बुढ़ायी! परंतु इस साल वर्षा कांस फूलने के बाद भी जमकर हुई. फिर भी रही वह किसान को असंतुष्ट कर देने वाली. गुरुग्राम को डुबो देना या दिल्ली में बारिश से घंटों जा जाम, यह कोई संतोष प्रदान करने वाली ख़बरें नहीं हैं. वर्ष को ख़ुशगवार तब माना जाता जब वह दिल्ली के आसमान में जून के लास्ट वीक में आती और सितंबर के आख़िर में जाती. यूं भी विक्रमी संवत् में इस साल जेठ का महीना दो बार पड़ा इसलिए त्योहारी सीजन अक्टूबर तक खिसका. अतः यह ज़रूरी था कि वर्षा ऋतु का चक्र सितंबर की समाप्ति तक चलता. तब फसल भी अच्छी होती और हर चेहरे पर खुशियाँ झलकतीं.
ओह सप्टेम्बर!
ओह सेप्टेंबर! दुनिया भर के पॉप गायकों ने इसे इसी तरह याद किया है. स्वीडन की मशहूर पॉप गायिका पेट्रा मार्कल्युंड ने अपने अलबम सेप्टेंबर आल ओवर में ला ला ला नेवर गिव इट गाकर तहलका मचा दिया था. सितंबर का आखिरी हफ्ता सबसे ज्यादा रोमेंटिक और पेज थ्री पार्टियों के अनुकूल माना जाता रहा है. समुद्र किनारे के ऊष्ण कटिबंधीय इलाकों में तो सितंबर घूमने और मौज मस्ती करने का महीना है. अपने यहां किसी भी पर्यटन स्थल को देखिए वहां जाने का सबसे अनुकूल महीना सितंबर ही बताया जाता है. सिटी ऑफ ज्वॉय यानी कैलकटा (कोलकाता) मे फरवरी से ही गरमी पड़ने लगती है, लेकिन यह सितंबर तो दगा दे गया. अब उत्तर पूर्व मानसून का भरोसा है, जो बंगाल की खाड़ी से उठेगा और पूर्वी घाट की पहाड़ियों को भिगोता हुआ जाएगा.
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