सिर्फ DM को राहत दी, पूरे फैसले पर रोक नहीं…मेधा रूपम मामले में SC ने किया स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) मेधा रूपम को राहत देने के आदेश में गुरुवार को स्पष्ट किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूरे आदेश पर रोक नहीं लगाई गई है. रोक सिर्फ हाईकोर्ट के उन हिस्सों पर है, जिसमें डीएम को छात्रा आकृति को 5 लाख रुपये का मुआवाजा देने को कहा गया था और उनके खिलाफ कदम उठाने समेत टिप्पणियां की गई थीं, जबकि छात्रा पर तामील एनएसए को रद्द करने के आदेश पर रोक नहीं लगाई गई है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को नोएडा में मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में एनएसए के तहत हिरासत में ली गई छात्रा आकृति चौधरी खिलाफ कार्रवाई को रद्द किया था. साथ ही डीएम को छात्रा को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया था और अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की बात कही थी. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस मसले पर आदेश दिया था, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के पैरा 27 से 33 पर रोक लगा दी गई थी. इन पैरा में ही डीएम के खिलाफ टिप्पणियों करते हुए हाईकोर्ट ने कदम उठाने का आदेश दिया था.
7 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
छात्रा के खिलाफ एनएसए रद्द करने के आदेश का जिक्र पैरा 25 में हाईकोर्ट ने किया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में रोक नहीं लगाई थी, लेकिन बड़े पैमाने पर यह खबर सार्वजनिक हुई कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने पूरे फैसले पर रोक लगा दी. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने आदेश में छोटा सा बदलाव कर यह स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर रोक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में नोटिस जारी कर दिया है और अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को तय की है.
HC के आदेश पर रोक की मांग
इस मामले में दो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थीं. एक डीएम मेधा रूपम की ओर से और दूसरी यूपी सरकार की ओर से. डीएम ने अपने खिलाफ आदेश पर रोक की मांग की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत दी, लेकिन यूपी सरकार की ओर से पूरे फैसले पर रोक लगाने की मांग पर आदेश नहीं दिया.
विवाद की वजह क्या है?
अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के एक हिंसक प्रदर्शन के दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था. इस मामले में 2 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छात्रा की NSA हिरासत को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया था. हाईकोर्ट ने डीएम की कार्रवाई को बिना सोचे-समझे लिया गया फैसला माना और छात्रा को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया, जो डीएम और संबंधित अधिकारियों के निजी वेतन से वसूला जाना था. अब यहीं मामला सुप्रीम कोर्ट में है.
डीएम मेधा रूपम और यूपी सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी को हिरासत में लेने की प्रक्रिया एक बहु-स्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, जिसमें ऊपर से नीचे तक कई अधिकारी शामिल होते हैं. इसलिए इस फैसले के लिए केवल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
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