डीयू में प्रदर्शन पर पूरी तरह बैन नहीं लगाया जा सकता: हाईकोर्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी और दिल्ली पुलिस के उस आदेश पर सवाल उठाए हैं, जिसमें यूनिवर्सिटी परिसर में विरोध-प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी। अदालत ने कहा कि प्रोटेस्ट, रैली, जुलूस और शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।

चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर कानून-व्यवस्था का उल्लंघन होता है तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है, लेकिन पूरी तरह से बैन लगाना सही तरीका नहीं है। अदालत ने यह भी पूछा कि ऐसा आदेश जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी और इसे किस आधार पर लागू किया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि आदेश में सार्वजनिक बैठक, रैली, जुलूस, धरना और किसी भी प्रकार के विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध की बात कही गई है। ऐसे में शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी इसके दायरे में आ जाते हैं, जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 का इस्तेमाल कर विरोध-प्रदर्शन पर रोक लगाने के फैसले पर भी सवाल उठाए।

हालांकि अदालत ने इस आदेश पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी और दिल्ली पुलिस को एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को होगी।

अदालत ने सुनवाई के दौरान छात्रों के व्यवहार पर भी टिप्पणी की और कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का गलत इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि केवल इसी अधिकार के कारण वह इस मामले में हस्तक्षेप कर रही है और छात्रों को जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए।

यह मामला दिल्ली यूनिवर्सिटी के लॉ फैकल्टी के छात्र उदय भदौरिया की याचिका पर सामने आया है। याचिका में 17 फरवरी को प्रॉक्टर कार्यालय द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी गई है, जिसमें विश्वविद्यालय परिसर और उससे जुड़े कॉलेजों में सार्वजनिक बैठक, जुलूस, प्रदर्शन और पांच या उससे अधिक लोगों के शांतिपूर्ण जमावड़े पर रोक लगाई गई थी।

यह आदेश यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की इक्विटी गाइडलाइंस को लेकर हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों के बाद जारी किया गया था। इसके बाद कुछ कॉलेजों ने भी एडवाइजरी जारी कर प्रतिबंध को और सख्त करते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी थी। दिल्ली पुलिस ने भी विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे, जिसे अप्रैल तक बढ़ा दिया गया है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की पूरी तरह से रोक संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन है और इससे विश्वविद्यालयों में होने वाली शैक्षणिक बहस और संवाद की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

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