हाईकोर्ट बोला-पत्नी का अलग रहना तलाक का आधार नहीं:क्रूरता-परित्याग के ठोस प्रमाण जरूरी, 15 साल से अलग रह रही; पति की अपील खारिज

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस संजय अग्रवाल जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने तलाक के मामले में अहम फैसला सुनाया है। डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि पत्नी का पति से अलग रहना तलाक का आधार नहीं हो सकता।
यह मामला 35 साल पुराने वैवाहिक संबंध का था। हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक के लिए क्रूरता और परित्याग के ठोस और स्पष्ट प्रमाण जरूरी हैं। इस मामले में न तो क्रूरता साबित हुई और न ही परित्याग। ऐसे में कोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और बेमेतरा फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।
जानिए क्या है पूरा मामला ?
दरअसल, बेमेतरा जिले के रहने वाले गिरधर दुबे ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। पति का कहना था कि उनकी पत्नी पिछले 14-15 सालों से उन्हें छोड़कर बेटी और दामाद के साथ रह रही है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पत्नी उनसे झगड़ा करती थी और मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थी। दोनों की शादी करीब 35 साल पहले हुई थी और उनके दो बच्चे हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। पति पेशे से पुजारी है और इन्हीं आधारों पर उन्होंने तलाक की मांग की थी।
पत्नी ने रखा अपना पक्ष
पत्नी ने पति की याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि पति गाली-गलौच, मारपीट और चरित्र पर शक करते थे। पत्नी ने यह भी बताया कि वह ब्लड प्रेशर और शुगर की मरीज है, लेकिन पति ने कभी उनके इलाज का खर्च नहीं उठाया। मजबूरी में उन्हें बेटी के घर रहना पड़ा।
फैमिली कोर्ट ने खारिज किया था केस
फैमिली कोर्ट, बेमेतरा ने 5 जुलाई 2023 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने माना कि पत्नी ने दो वर्ष या उससे अधिक समय तक जानबूझकर परित्याग नहीं किया, यह साबित नहीं हुआ। पति की ओर से लगाए गए क्रूरता के आरोप अस्पष्ट और सामान्य पाए गए। प्रस्तुत साक्ष्य तलाक के लिए पर्याप्त नहीं माने गए।
हाईकोर्ट ने की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल अलग-अलग रहना परित्याग नहीं माना जा सकता। क्रूरता साबित करने के लिए ठोस घटनाएं, साफ आरोप और पुख्ता सबूत जरूरी होते हैं। पति के गवाहों के बयान सामान्य पाए गए और उन पर भरोसा नहीं किया जा सका। महिला प्रकोष्ठ की काउंसलिंग रिपोर्ट से पत्नी के आरोप अधिक विश्वसनीय लगे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने साफ किया कि तलाक जैसे गंभीर मामले में सिर्फ अंदाजे या सामान्य आरोपों के आधार पर फैसला नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का फैसला सही है और रिकॉर्ड के खिलाफ नहीं है। इसी कारण पति की अपील खारिज कर दी गई।










