दुनिया बच्चों को AI से दूर कर रही, भारत में 18 करोड़ से ज्यादा नाबालिग स्मार्टफोन यूजर्स, क्या हमारे पास कोई प्लान है?

क्या बच्चों को AI से दूर रखना चाहिए? यह सवाल दुनिया के कई देशों में अब कानून और नीति का हिस्सा बन चुका है. नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, डेनमार्क और यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्र बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर सख्त नियम लागू कर रहे हैं. इन देशों का मानना है कि एल्गोरिदम आधारित प्लेटफॉर्म और जनरेटिव AI बच्चों के मानसिक विकास, प्राइवेसी और सामाजिक व्यवहार पर असर डाल सकते हैं. नॉर्वे सरकार का कहना है कि AI का इस्तेमाल करने के बजाए छोटे बच्चों को पहले पढ़ना, लिखना और गणित जैसी बुनियादी क्षमताएं विकसित करनी चाहिए.

दूसरी तरफ भारत में स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई देती है. विभिन्न रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में 15 साल से कम उम्र के 18 करोड़ से अधिक बच्चे नियमित रूप से स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये बच्चे सिर्फ वीडियो देखने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सोशल मीडिया, चैटजीपीटी, स्नैपचैट और अन्य जनरेटिव AI टूल्स का भी उपयोग कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जब दुनिया बच्चों को स्क्रीन और AI के प्रभाव से बचाने की कोशिश कर रही है, तब भारत की तैयारी कितनी मजबूत है.

दुनिया क्यों बढ़ा रही है बच्चों पर डिजिटल कंट्रोल?

दुनिया के कई देशों का मानना है कि बच्चों का बचपन स्क्रीन और एल्गोरिदम के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता. इसी सोच के तहत नॉर्वे सरकार ने सोशल मीडिया इस्तेमाल की न्यूनतम उम्र 16 साल करने का विधेयक पेश किया है. इसके तहत टेक कंपनियों को उम्र वेरिफिकेशन की कानूनी जिम्मेदारी निभानी होगी. सरकार का तर्क है कि बच्चों को कम उम्र में एल्गोरिदम आधारित कंटेंट के संपर्क में आने से बचाना जरूरी है. ऑस्ट्रेलिया भी इसी दिशा में आगे बढ़ चुका है. वहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया और एल्गोरिदम आधारित प्लेटफार्म पर सख्त प्रतिबंध लागू किया गया है. इन कदमों का मकसद बच्चों की मानसिक सेहत, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत करना है.

यूरोपीय संघ ने डिजिटल सर्विसेज एक्ट यानी DSA के तहत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को प्राथमिकता दी है. इस कानून के अनुसार टेक कंपनियां बच्चों के डेटा की प्रोफाइलिंग नहीं कर सकतीं और न ही उन्हें टारगेटेड विज्ञापन दिखा सकती हैं. हाल ही में यूरोपियन कमीशन ने उम्र सत्यापन के लिए एक विशेष ऐप भी जारी किया है.

फ्रांस और डेनमार्क ने भी स्कूलों को मोबाइल-फ्री जोन बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं. इन देशों का मानना है कि बच्चों को वास्तविक दुनिया, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है. यही वजह है कि डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर लगातार नए नियम बनाए जा रहे हैं.

जरूरी बातें

  • भारत में 1 अरब से ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स हैं.
  • 18 करोड़ से ज्यादा यूजर्स 15 साल या इससे कम उम्र के हैं.
  • 53% यूजर्स की उम्र 18-24 साल के बीच है.
  • भारत में 37GB प्रति माह औसत डेटा खपत स्मार्टफोन पर होती है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है.
  • भारत में डेटा सुरक्षा नियम हैं, लेकिन बच्चों पर AI के प्रभाव को लेकर अलग नीति नहीं है.

भारत में बच्चों के लिए AI और तैयारी?

AI का इस्तेमाल केवल ऑफिस तक सीमित नहीं है. भारत सरकार भी कम उम्र से ही बच्चों को AI की जानकारी देने पर जोर दे रही है. अटल इनोवेशन मिशन और इंडियाएआई मिशन के तहत 13 से 21 साल के युवाओं के लिए YUVAi ग्लोबल यूथ चैलेंज जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. वहीं शिक्षा मंत्रालय ने ‘AI फॉर स्कूल्स’ पहल के तहत सीबीएसई के 18,000 से अधिक स्कूलों में AI आधारित पाठ्यक्रम शुरू किया है, जिसे अब तीसरी कक्षा तक बढ़ाया जा रहा है.

हालांकि भारत में बच्चों के लिए AI इस्तेमाल करने की कोई स्पष्ट उम्र सीमा नहीं है. ज्यादातर AI प्लेटफॉर्म अपनी शर्तों के आधार पर काम करते हैं. उदाहरण के लिए, 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कुछ सेवाओं में माता-पिता की अनुमति जरूरी होती है. दूसरी ओर अमेरिका और यूरोप में बच्चों के डेटा की सुरक्षा के लिए सख्त नियम हैं, जहां कम उम्र के बच्चों का डेटा जुटाने से पहले कंपनियों को माता-पिता से वेरिफिकेशन लेना होता है.

भारत सरकार की AI गवर्नेंस गाइडलाइंस में यह जरूर कहा गया है कि शिक्षा और सरकारी क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले AI टूल्स बच्चों की सुरक्षा, डेटा प्राइवेसी और भेदभाव रोकने जैसे मानकों का पालन करें. लेकिन बच्चों के लिए AI उपयोग को लेकर अभी भी अलग और व्यापक नियमों की कमी महसूस की जा रही है.

भारत में 18 करोड़ बच्चों की डिजिटल दुनिया

भारत में डिजिटल पहुंच तेजी से बढ़ी है और इसका सबसे बड़ा असर बच्चों के बीच दिखाई देता है. विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार 15 साल से कम उम्र के 18 करोड़ से अधिक बच्चे नियमित रूप से स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. यूट्यूब, इंस्टाग्राम रील्स और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स के साथ-साथ बच्चे अब चैटजीपीटी, स्नैपचैट माय AI और अन्य जनरेटिव AI टूल्स का भी उपयोग कर रहे हैं.

AI आधारित टूल्स बच्चों के लिए जानकारी और सीखने का नया माध्यम बन रहे हैं. हालांकि इसके साथ कई जोखिम भी जुड़े हुए हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार AI पर निर्भर रहने से बच्चों की खुद सोचने और समस्या सुलझाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसके अलावा डीपफेक, साइबर बुलिंग और भ्रामक जानकारी तक आसान पहुंच जैसी चुनौतियां भी सामने हैं.

भारत का कानून क्या कहता है?

भारत सरकार ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन यानी DPDP नियमों के जरिए बच्चों के डेटा की सुरक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान किए हैं. इन नियमों के तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा प्रोसेस करने से पहले प्लेटफॉर्म को माता-पिता की सत्यापित सहमति लेनी होगी. इसके लिए डिजिलॉकर, सरकारी पहचान पत्र या वीडियो सत्यापन जैसे विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है. इसके अलावा कंपनियों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी करने और उन्हें टारगेटेड विज्ञापन दिखाने की अनुमति नहीं होगी. सरकार का फोकस फिलहाल डेटा सुरक्षा और गोपनीयता पर ज्यादा है. हालांकि ये नियम अभी चरणबद्ध तरीके से लागू हो रहे हैं.

गांव से शहर तक, हर युवा की जेब में स्मार्टफोन

भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में शामिल है. DataReportal के अनुसार, देश में 1.06 अरब से अधिक सक्रिय मोबाइल कनेक्शन और 1.03 अरब इंटरनेट यूजर्स हैं. वहीं IAMAI-Kantar की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 95.8 करोड़ एक्टिव इंटरनेट यूजर्स हैं और 94 प्रतिशत से ज्यादा लोग इंटरनेट चलाने के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. उम्र के हिसाब से देखें तो 18 से 24 वर्ष आयु वर्ग के युवा सबसे बड़े स्मार्टफोन यूजर हैं, जिनकी हिस्सेदारी करीब 53 प्रतिशत है. इसके बाद 25 से 34 वर्ष आयु वर्ग का हिस्सा 32 प्रतिशत और 35 से 44 वर्ष आयु वर्ग का हिस्सा 11 प्रतिशत है. आंकड़ों के अनुसार, 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के 95.5 प्रतिशत ग्रामीण और 97.6 प्रतिशत शहरी युवाओं के पास स्मार्टफोन मौजूद है. दिलचस्प बात यह है कि एक भारतीय स्मार्टफोन यूजर्स औसतन हर महीने 37GB डेटा खर्च करता है, जो दुनिया में सबसे अधिक है.

भारत में तेजी से बढ़ रहा है AI का इस्तेमाल

स्मार्टफोन के साथ AI का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है. IAMAI के मुताबिक, भारत के 44 प्रतिशत इंटरनेट यूजर्स किसी न किसी रूप में AI फीचर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. वहीं देश में 10 करोड़ से ज्यादा सक्रिय AI यूजर्स हैं. सबसे ज्यादा उपयोग 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग में देखा गया है, जहां 57 प्रतिशत युवा AI आधारित टूल्स और फीचर्स का उपयोग करते हैं. माइकल पेज की टैलेंट ट्रेंड्स 2026 इंडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 73 प्रतिशत प्रोफेशनल्स अपने काम में जेनरेटिव AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. सिर्फ दो साल पहले यह आंकड़ा 47 प्रतिशत था. इससे साफ है कि AI अब केवल नई तकनीक नहीं, बल्कि कामकाज का अहम हिस्सा बन चुका है.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
close
Virus-free.www.avast.com