हमने ‘क्यों’ पूछना क्यों छोड़ दिया, क्या सब पता होना इतना आसान है!

एक समय था जब हम हर चीज के बारे में सवाल पूछते थे. हम पूछते थे कि आसमान का रंग क्यों बदलता है, हमारे माता-पिता काम पर क्यों जाते हैं, एक बच्चे के पास ज्यादा खिलौने क्यों हैं और दूसरे के पास कम, लोग बड़े क्यों होते हैं और कुछ लोग मरने के बाद वापस क्यों नहीं आते. किसी ने हमें सवाल पूछना नहीं सिखाया था. हम बस जानना चाहते थे. फिर धीरे-धीरे कुछ बदल गया. स्कूल ने हमें सही जवाब ढूंढना सिखाया. काम ने हमें काम जल्दी पूरा करना सिखाया. समाज ने हमें अपनी राय रखना सिखाया. बड़े होते-होते हमने पक्का बोलना सीख लिया और एक दिन बिना हमें पता चले हमने ‘क्यों’ पूछना कम कर दिया और कहना शुरू कर दिया ‘मुझे पता है’. शायद इंसान के भीतर होने वाले सबसे शांत बदलावों में से एक यही है.

जरा सोचिए, हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में यह कैसे होता है. कोई हमें किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में कुछ बताता है और हम मान लेते हैं. कोई हमारे फोन पर कोई संदेश भेजता है और हम उसे आगे भेज देते हैं. कोई ऐसा व्यक्ति, जिसकी हम इज्जत करते हैं, अपनी राय देता है और हम उसे सच मान लेते हैं. कोई हमसे असहमत होता है और हमें अच्छा नहीं लगता.

बहुत कम बार हम रुककर पूछते हैं, ‘मुझे कैसे पता कि यह सच है?’. सवाल बहुत छोटा है, लेकिन यह बहुत कुछ बदल सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि हमें हर व्यक्ति पर या हर बात पर शक करना चाहिए. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि अपने मन में एक छोटी-सी खिड़की खुली रखनी चाहिए. उस खिड़की से कोई दूसरी संभावना अंदर आ सकती है.

क्या हमें पता है कि कब चुप रहना चाहिए?

आज एक छोटा बच्चा भी मोबाइल चला सकता है, बिना यह समझे कि वह क्या कर रहा है. वह गेम खेल सकता है, वीडियो देख सकता है और रोज नए सवाल सीख सकता है, लेकिन कोई दूसरा बच्चा पूछ सकता है, ‘अगला वीडियो कौन तय करता है कि मुझे क्या देखना चाहिए?’ यह एक अलग तरह का सवाल है. पहला बच्चा मशीन को चलाना जानता है. दूसरा यह सोचने लगा है कि मशीन उस बच्चे के साथ क्या कर रही है. जिंदगी में भी ऐसा ही होता है.

हम चीजों का इस्तेमाल करना तो बहुत अच्छी तरह सीख जाते हैं, लेकिन यह पूछना भूल जाते हैं कि वे चीजें हमारे साथ क्या कर रही हैं। हमें पैसा कमाना आता है, लेकिन क्या हमें पता है कि हमें इतना पैसा क्यों चाहिए? हमें बोलना आता है, लेकिन क्या हमें पता है कि कब चुप रहना चाहिए? हमें बहस जीतना आता है, लेकिन क्या हमें पता है कि वह बहस हमारे रिश्ते के साथ क्या कर रही है?

ज्ञान की खूबसूरती क्या है?

इंसान का ज्ञान भी इसी तरह आगे बढ़ता है. किसी ने कुछ खोजा. किसी दूसरे ने उस पर सवाल किया. किसी दूर बैठे व्यक्ति ने उसमें कुछ बदला. किसी और पीढ़ी ने उसे बेहतर बनाया. विचार देशों, भाषाओं और सदियों के पार चलते रहे. आज हम जो कुछ जानते हैं, वह किसी एक जगह या किसी एक इंसान की देन नहीं है. उसमें बहुत सारे इंसानों के विचार मिले हैं.

एक किसान मिट्टी को उस व्यक्ति से बेहतर समझ सकता है, जिसने खेती के बारे में केवल किताब पढ़ी हो. एक मजदूर समुद्र को उस तरह समझ सकता है, जिस तरह कोई कवि पूरी तरह नहीं समझ सकता. फिर भी दोनों के पास एक-दूसरे से सीखने के लिए कुछ न कुछ होता है. यही तो ज्ञान की खूबसूरती है. किसी की बात सुनने का मतलब यह नहीं कि हम उसकी हर बात को सच मान लें. इसका मतलब है कि फैसला करने से पहले इतना विनम्र जरूर रहें कि एक बार उसे समझ लें.

और फिर यही सवाल हमारी तरफ मुड़ जाता है. हम दूसरों के बारे में बहुत कुछ जानना चाहते हैं, लेकिन खुद को समझने की कोशिश बहुत कम करते हैं. हमें ठीक-ठीक पता होता है कि हमारा सहकर्मी गलत क्यों है, पड़ोसी ऐसा क्यों करता है, हमारे बच्चों को हमारी बात क्यों माननी चाहिए और दूसरे व्यक्ति को क्यों बदलना चाहिए.

लेकिन हम कितनी बार पूछते हैं, ‘अगर इस समस्या में मेरी भी कुछ गलती हो तो?’ हमें अपनी सफलताएं याद रहती हैं, अपनी गलतियां उतनी आसानी से याद नहीं रहतीं. हमें वे लोग अच्छे लगते हैं जो हमसे सहमत होते हैं. हम अपनी उन राय को बचाते रहते हैं जो धीरे-धीरे हमारी पहचान का हिस्सा बन जाती हैं और फिर एक दिन हमारी राय एक दीवार बन जाती है, यह भूलकर कि वह दीवार हमने खुद बनाई थी.

कभी-कभी वर्षों की पढ़ाई भी हो जाती है फेल

कल्पना कीजिए, एक बूढ़ा आदमी एक पांच साल के बच्चे के साथ बैठा है. बच्चा पूछता है, ‘क्या आपको सब कुछ पता है?’ बूढ़ा हंसकर कहता है, नहीं. बच्चा उसकी तरफ देखकर पूछता है, फिर आपसे क्यों बोलते हैं जैसे आपको सब कुछ पता है? बूढ़े आदमी के पास तुरंत कोई जवाब नहीं है. शायद उसे जवाब देने की जरूरत भी नहीं है. कभी-कभी एक बच्चे का सवाल उस जगह तक पहुंच जाता है, जहां वर्षों की पढ़ाई भी नहीं पहुंच पाती.

बड़े होने का मतलब क्या है?

शायद बड़े होने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि हम हर बात को लेकर निश्चिंत हो जाएं. शायद बड़े होने का मतलब यह है कि हम यह समझने लगें कि कौन से सवाल सच में जरूरी हैं. पांच साल की उम्र में हम पूछ सकते हैं, आसमान नीला क्यों है? पचास की उम्र में शायद हमें पूछना चाहिए, मुझे गलत होने से इतना डर क्यों लगता है? सत्तर की उम्र में शायद, मैंने लोगों को प्रभावित करने में इतना समय क्यों लगा दिया? और नब्बे-पंचानवे की उम्र में शायद सवाल बहुत सरल हो जाए, मेरे जीवन में सचमुच महत्वपूर्ण क्या था?

हम पूरी जिंदगी जवाब इकट्ठा करते रह सकते हैं और फिर भी उस सवाल को भूल सकते हैं, जो चुपचाप हमारे भीतर हमारा इंतजार कर रहा था. तो अगर सिर्फ एक दिन के लिए आप यह साबित करना छोड़ दें कि आप सही हैं, तो वह पहला सवाल कौन-सा होगा जिसे पूछने की हिम्मत आप आखिरकार खुद से करेंगे?

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पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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