देशी धान की विरासत बचाने में जुटा किसान, आधे एकड़ खेत में संरक्षित की 76 पारंपरिक किस्में

रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड के खैरबहार गांव के किसान भवानी पंडा ने देशी धान की विलुप्त होती पारंपरिक किस्मों को संरक्षित करने का अनूठा अभियान शुरू किया है। उन्होंने खेती को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि कृषि विरासत को बचाने का मिशन बनाया है। महज आधे एकड़ खेत में उन्होंने 76 किस्मों के देशी धान का संरक्षण कर एक नई पहचान बनाई है।
करीब तीन वर्ष पहले शुरू हुई इस पहल की प्रेरणा उन्हें परिवार में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बाद मिली। खेती, भोजन और स्वास्थ्य के संबंध को समझने के दौरान उनका रुझान जैविक खेती और पारंपरिक धान की किस्मों की ओर बढ़ा। इसके बाद उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों से देशी धान के बीज एकत्रित कर उनका संरक्षण शुरू किया। वर्तमान में उनके संग्रह में मूलामंजी, जवाफूल सहित कई दुर्लभ पारंपरिक किस्में शामिल हैं।
भवानी पंडा केवल बीजों का संरक्षण ही नहीं कर रहे, बल्कि अन्य किसानों को भी देशी धान की खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनके पास रायगढ़, जांजगीर-चांपा, सरगुजा सहित अन्य जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश के बलिया और ओडिशा के कटक से भी किसान बीज लेने और खेती की जानकारी प्राप्त करने पहुंच रहे हैं। वे कई किसानों को नि:शुल्क बीज भी उपलब्ध करा चुके हैं ताकि पारंपरिक धान की खेती का दायरा बढ़ सके।
उनके प्रयासों को हाल ही में रायपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्होंने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के सहयोग से 28 देशी धान की किस्मों के नमूने राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण के लिए भेजे। इनमें से 21 किस्मों का चयन राष्ट्रीय स्तर की प्रक्रिया के लिए किया गया, जबकि सात किस्में पहले से पंजीकृत होने के कारण चयन प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सकीं।
भवानी पंडा जैविक खेती को भी समान रूप से बढ़ावा दे रहे हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक बीजों के बेहतर उत्पादन के लिए मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना जरूरी है। इसलिए वे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बजाय प्राकृतिक जैविक संसाधनों का उपयोग करते हैं। सीमित संसाधनों से शुरू हुआ उनका यह प्रयास अब देशी धान संरक्षण और जैविक खेती के क्षेत्र में प्रेरणादायक उदाहरण बन चुका है।










