न्याय की चौखट पर हताशा की आग: इटावा कलेक्ट्रेट में वृद्ध किसान का आत्मदाह का प्रयास, पुलिस की मुस्तैदी से बची जान

इटावा: कलेक्ट्रेट परिसर शनिवार को उस वक्त सन्न रह गया, जब न्याय की गुहार लगाते-लगाते टूट चुके एक वृद्ध किसान ने आत्मदाह का प्रयास कर डाला. अपनी ही जमीन पर अदालत के स्पष्ट स्टे आदेश के बावजूद धड़ल्ले से कराए जा रहे निर्माण से त्रस्त किसान ने डीजल का डिब्बा उठाया, लेकिन मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों की सतर्कता ने उसे आग बनने से पहले ही बुझा दिया. पल भर की देरी एक भयावह हादसे में बदल सकती थी.

सूचना मिलते ही सिविल लाइंस प्रभारी निरीक्षक सुनील कुमार किसान को सीधे जिलाधिकारी शुभ्रांत कुमार शुक्ल के समक्ष ले गए. जिलाधिकारी ने मामले की गंभीरता को भांपते हुए बिना वक्त गंवाए एसडीएम ताखा को मौके पर भेजा और अवैध निर्माण तत्काल रुकवाने के साथ दोषियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश जारी किए.

ऊसराहार थाना क्षेत्र के नगला चती गांव निवासी किसान वीरेंद्र सिंह ने फूट-फूटकर बताया कि वह बीते तीन महीनों से अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काट रहा था, मगर उसकी सुनवाई कहीं नहीं हुई. आरोप है कि गांव की एक महिला अपने दो बेटों के साथ उसकी जमीन पर अवैध कब्जा कर निर्माण करा रही है और प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं.

पीड़ित किसान ने बताया कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है और सिविल जज द्वारा गाटा संख्या 218 पर यथास्थिति बनाए रखने का स्पष्ट स्टे आदेश पारित किया जा चुका है, जिसकी अगली सुनवाई 4 फरवरी 2026 को तय है. इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा. किसान का कहना है कि खसरा-खतौनी और इंतखाब में भी गाटा संख्या 218 पर उसका वैध स्वामित्व दर्ज है.

किसान ने यह सनसनीखेज आरोप भी लगाया कि भरथना-ऊसराहार रोड निर्माण में विपक्षी पक्ष की जमीन पहले ही पीडब्ल्यूडी द्वारा अधिग्रहित हो चुकी है, जिससे उनके पास अब कोई निजी भूमि नहीं बची. इसके बावजूद वे सरकारी भूमि गाटा संख्या 67 को 68 बताकर सीमा विवाद रचते हुए उसकी जमीन पर कब्जा करने की साजिश कर रहे हैं. विरोध करने पर जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं. इसी भय, अपमान और बेबसी ने किसान को आत्मदाह जैसे खौफनाक कदम तक धकेल दिया.

जिलाधिकारी के सख्त निर्देशों के बाद एसडीएम ताखा श्वेता मिश्रा, तहसीलदार, कानूनगो और पुलिस बल मौके पर पहुंचे. अवैध निर्माण तुरंत रुकवाया गया, जमीन की पैमाइश कराई गई और ऊसराहार थाना पुलिस को कोर्ट के स्टे आदेश का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए गए. प्रशासन की तत्परता से एक जान तो बच गई, लेकिन सवाल अब भी कायम है, अगर समय रहते न्याय मिल जाता, तो क्या किसान को आग का रास्ता चुनना पड़ता?

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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