ऑपरेशन ‘SIR’… क्या मनमर्जी कर रहे हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर उंगलियां उठ रही हैं. प्रश्नचिह्न उस SIR प्रक्रिया को लेकर भी है जिसकी लड़ाई संसद से सुप्रीम कोर्ट तक चल रही है. लेकिन इस पूरे चर्चा में एक तरफ ज्ञानेश कुमार हैं और दूसरी तरफ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं.

सवाल ये है कि क्या चुनाव आयोग में कामकाज को लेकर मतभेद है? क्या चुनाव आयोग में दो आयुक्तों की नहीं सुनी जा रही? क्या आयोग में नियम और प्रक्रिया का पालन नहीं हो रहा? क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपनी मर्जी चला रहे हैं? क्या चुनाव आयोग को बाहर से कोई और कंट्रोल कर रहा है? आखिर चुनाव आयुक्तों को कैबिनेट सचिव से शिकायत क्यों करनी पड़ी?

ऐसे कई सवाल हैं जिन्हें लेकर सोशल मीडिया से लेकर हर प्लेटफॉर्म पर बहस हो रही है. विपक्ष वोट चोरी के आरोप पहले से लगा रहा था और जब इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट छपी तो उनके हाथ चुनाव आयोग और सरकार को घेरने का सबसे बड़ा हथियार लग गया. सफाई चुनाव आयोग की ओर से भी आई लेकिन सबसे पहले उस रिपोर्ट को देख लेते हैं जिस पर आज दिनभर हंगामा होता रहा.

बिना सहमति के लिए फैसले

अखबार की रिपोर्ट में दावा है कि CEC ज्ञानेश कुमार ने बिना सहमति बनाए मनमाना तरीके से फैसले लिए. जिनमें कई फैसलों पर चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी ने आपत्तियां दर्ज कराईं. अखबार के मुताबिक 10 महीने में 14 बार CEC के फैसले को लेकर आधिकारिक तौर पर आपत्ति दर्ज कराई गई.

नौबत यहां तक आ गई कि एक ही दिन में चुनाव आयुक्तों ने चार-चार बार आपत्तियां दर्ज कराई. इनमें ज्यादा आपत्तियां नए वोटर जोड़ने, नाम हटाने और SIR प्रक्रिया को लेकर थीं. मामला यहां तक पहुंच गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों को अपनी शिकायत लेकर कैबिनेट सचिव तक जाना पड़ गया.

2 चुनाव आयुक्तों को प्रक्रिया से दूर रखा

ये दावा है कि कई मामलों में 2 चुनाव आयुक्तों को जानबूझकर प्रक्रिया से दूर रखा गया. न्यूजपेपर ने अपनी रिपोर्ट में तारीख के साथ एक एक ब्यौरा दिया है. किस आयुक्त ने कब और क्या आपत्ति जताई ये सिलसिलेवार तरीके से बताया गया है.

मतभेद की शुरुआत पिछले साल ही हो गई थी. बिहार में SIR शुरू होने के बाद से ही विपक्ष चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा था. The Indian Express की पड़ताल में भी इसे लेकर जानकारी सामने आई हैं. चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और फॉर्म-6 में हुए बदलाव पर विस्तार से चर्चा की गई है. किसने कब क्या आपत्ति दर्ज कराई, इसे आप तारीख के हिसाब समझिए.

28 अक्टूबर 2025: चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने कहा कि EC के नाम से आयोग की मंजूरी के बिना पत्र और आदेश जारी किए गए.

16 अप्रैल 2026: सुखबीर सिंह संधू ने ये आपत्ति दर्ज कराई कि नए IT मॉड्यूल और पोर्टलों के बारे में जानकारी मीडिया से मिली. यानी उन्हें इसका पता ही नहीं था.

उसी दिन उन्होंने इस पर भी ऐतराज जताया कि आयोग की मंज़ूरी के बिना आधिकारिक संदेश जारी किए गए. यही वो तारीख थी जब दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इस बात पर आपत्ति जताई कि एक साल से ज्यादा वक्त से आयोग की बैठक के बाद विवरण जारी किए गए. यही नहीं अगली बैठक का एजेंडा पहले से नहीं बताया जा रहा था.

मंज़ूरी के बिना अधिकारियों की विदेश यात्रा

इसके अलावा उन्होंने आयोग की मंज़ूरी के बिना अधिकारियों को विदेश यात्राओं पर भेजने का भी मुद्दा उठाया. 24 अप्रैल को विवेक जोशी ने दोबारा बताया कि आयोग की मंजूरी के बिना कोई संदेश जारी नहीं होना चाहिए. 16 मई को सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ. विवेक जोशी ने कहा कि सरकार की मंजूरी के बिना फॉर्म-6 में बदलाव न किया जाए.

19 मई को इस बात पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी सहमति जताई.यहां सवाल है कि ये बदलाव कौन करवा रहा था. 29 मई को विवेक जोशी ने कहा कि वोटर लिस्ट का डेटाबेस केंद्रीकृत किया जा रहा है. इसका ऑडिट जरूरी है.

आयोग से निकलकर ये मामला 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव तक पहुंचा. कैबिनेट सचिव से विवेक जोशी ने शिकायत की कि आधिकारिक रूप से कार्यों का पुनर्वितरण. आयोग की जानकारी के बिना किया गया. उसी दिन सुखबीर संधू ने कैबिनेट सचिव के सामने रोस्टर संबंधी मुद्दे को दोहराते हुए संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की.

30 जुलाई को चुनाव आयुक्त जोशी और संधू ने कार्य-वितरण के नए आदेश को खारिज कर दिया. फिर 12 अगस्त को सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल के ट्रिब्यूनल के सामने EC की ओर से अपील की अनुमति किसने दी? यानी उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी.

13 अगस्त को सुखबीर सिंह संधू ने फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को अनधिकृत और ‘अवैध’ बताया. उसके अगले ही दिन ऑनलाइन सिस्टम को लेकर भी सुखबीर सिंह संधू ने सवाल खड़े किए.उन्होंने कहा कि फील्ड अधिकारियों को ECI Net सिस्टम तक पहुंच नहीं मिल रही थी. कहा गया कि DG (IT) के पास इसे प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं. यानी एक तरह से सॉफ्टवेयर की पारदर्शिता पर ये सवाल है.

कामकाज को लेकर आपत्तियां दर्ज करवाईं

मतलब एक साल से भी कम समय में कामकाज को लेकर इतनी आपत्तियां दर्ज करवाई गईं. मामला कैबिनेट सचिव तक पहुंचा लेकिन हुआ क्या. सबसे ज्यादा आपत्ति Form-6 और बंगाल में SIR पर अपील को लेकर है. जो लोगों की परेशानी का कारण भी बना. वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए Form-6 भरा जाता है.

आपत्ति ये थी कि Form-6 में नए सवाल क्यों जोड़े गए? जुलाई 2026 में इसके ऑनलाइन संस्करण में एक नया सवाल जोड़ा गया. पूछा गया कि क्या आवेदक का नाम पिछली SIR की वोटर लिस्ट में था? अगर नहीं, तो क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR की सूची में था? दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस सवाल को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया था.

पश्चिम बंगाल SIR पर अपील किसने दायर की?

दूसरी बड़ी आपत्ति ये थी कि पश्चिम बंगाल SIR पर अपील किसने दायर की? बंगाल में SIR के बाद 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए. चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ट्रिब्यूनल के सामने करीब 38 लाख अपीलें लंबित हैं. 22.21 लाख अपील उन लोगों ने खुद की है, जिनके नाम हटाए गए. 16.10 लाख अपील उन लोगों के खिलाफ हैं, जिन्हें वोटर लिस्ट में शामिल करने का फैसला किया था. सुखबीर सिंह संधू का सवाल था. इन 16.10 लाख लोगों के खिलाफ अपील आखिर आयोग की तरफ से किसने की? क्या इसके लिए पूरे चुनाव आयोग की मंजूरी थी?

यानी एक तरह से चुनाव आयुक्त ये कह रहे हैं कि उन्हें अंधेरे में रखकर आयोग में फैसले लिए जा रहे थे. अखबार की पड़ताल में पर्दाफाश होने के बाद चुनाव आयोग की तरफ से भी सफाई आई। पहले सूत्रों के हवाले से जानकारी आने लगी. और दोपहर 2 बजे आधिकारिक तौर पर एक पन्ने का बयान जारी किया गया. कुल मिलाकर 8 पॉयंट में चुनाव आयोग की तरफ से सफाई दी गई.

सभी अफसरों को आपत्ति का अधिकार

डिप्टी डायरेक्टर की तरफ से प्रेस रिलीज जारी की गई जिसमें कहा गया कि चुनाव आयोग के सारे फैसले कानूनी प्रक्रिया के तहत होते हैं. चुनाव आयुक्तों की आपत्ति एक प्रक्रिया का हिस्सा है. सभी अफसरों को आपत्ति का अधिकार है. आयोग के भीतर अलग अलग राय होना सामान्य बात है. अंतिम फैसले से पहले विचार विमर्श होते हैं. विचार-विमर्श और मतभेद निर्णय का ही हिस्सा हैं. चुनिंदा नोट पेश करना अधूरी तस्वीर दिखाने जैसा है.पिछले एक साल में सभी फैसले एकमत से लिए गए हैं. सफाई में चुनाव आयोग ने आखिर में कहा कि वो पूरी तरह निष्पक्ष है.

इस मामले ने पूर्व चुनाव आयुक्तों की चिंता बढ़ा दी है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने कहा कि बहुमत से फैसले अगर नहीं हुए हैं तो सारे फैसले गैर-कानूनी हैं. पूरे डेढ़ साल में जो-जो फैसले लिए गए हैं, उसकी पूरी लिस्ट बनाई जाए. पब्लिक की जाए कि उनमें से कितने सर्वसम्मति से लिए गए थे. बहुमत से कितने लिए गए, वो भी ठीक डिसीजन है. उनको भी कोई क्वेश्चन नहीं कर सकता. लेकिन माइनॉरिटी होते हुए, उनको बाईपास करते हुए, उनकी आपत्ति को खारिज करते हुए, अगर आपने कोई फैसला किया है तो वो गैर-कानूनी है. इसलिए वो सब वापस होने चाहिए, वो सब पलट देने चाहिए.

ये किस चीज का इंतजार कर रहे थे?

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, ओपी रावत ने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसा इलेक्शन कमीशन के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ. ये भी समझ नहीं आता है कि जब सबको मालूम है. कि इलेक्शन कमीशन के निर्णय या तो सर्वसम्मति से होते हैं. या मेजॉरिटी से, तो फिर ये जो इलेक्शन कमिश्नर्स हैं . ये किस चीज का इंतजार कर रहे थे? क्या इन्होंने सोचा? इन्हें अगर पहली बार ही लगता है कि उनकी राय नहीं मानी गई. या उनकी मेजॉरिटी के फैसले को नहीं माना गया. या उन्हें बिना बताए कुछ फैसला लिया गया तो सीधे उन्हें. सारे कागज़ों के साथ महामहिम राष्ट्रपति को जाकर शिकायत करनी थी.

विपक्ष ने भी उठाए सवाल

वहीं वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल का कहना है पुराने सभी चुनाव रद्द किए जाएं और सुप्रीम कोर्ट मामले का संज्ञान ले. आज ये तय हो गया है कि बहुमत ज्ञानेश कुमार के साथ नहीं था. ज्ञानेश कुमार अपनी मनमर्जी से फैसले करते थे। किस तरह इलेक्शन चलाना है, क्या ईआरओ को करना है, कौन सा फॉर्म फाइल करना है, ये तय करते थे ज्ञानेश कुमार. तो पहली बात तो ये कि इलेक्शन कमीशन ने सारा सिस्टम सेंट्रलाइज कर लिया. कानून के खिलाफ था। इलेक्शन कमीशन की प्रक्रिया के खिलाफ था.

कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि आज जो भी बात सामने आई है, उससे हमको मालूम पड़ता है कि माननीय CEC ने सिर्फ देश को भ्रमित नहीं किया, उन्होंने देश के संवैधानिक मूल्यों को सिर्फ आघात नहीं दिया जो कि बहुत अरसे से वो कर रहे हैं. उन्होंने अपने खुद के साथियों को भ्रमित किया. उन्होंने चुनाव आयोग को हाईजैक करके एक प्रकार से अलग कर दिया. उन्होंने अपने खुद के ECs को हाईजैक कर दिया. ये एक आंतरिक बुलडोजर का उदाहरण है. बाहरी बुलडोजर और आंतरिक बुलडोजर किस प्रकार से पार्टनरशिप में काम कर सकते हैं. उसका ये एक बहुत घिनौना उदाहरण है.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर अखबार ने जो पर्दाफाश किया. उसे लेकर तीन पूर्व सीएम तुरंत उन्हें अरेस्ट करने की मांग कर रहे हैं. बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा. ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी हो. पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ही वोट चोरी के सरगना हैं. उनकी गिरफ्तारी हो. पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे ने उन्हें पद से हटाने के साथ जेल में बंद करने की मांग की.

विपक्ष की तरफ से लगातार आवाज बुलंद हो रही है. राहुल गांधी बार बार वोट चोरी का आरोप लगाते रहे हैं. उन्होंने 15 सेकेंड का वीडियो जारी करके पोस्ट लिखा कि वोट की चोरी भारत के लोगों के ख़िलाफ़ अपराध और संविधान पर सीधा हमला है. इसे अंजाम देने वाले BJP, RSS और EC ने देशद्रोह का काम किया है. RJD सांसद सुधाकर सिंह ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में लेकर जाने की बात कही.

ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक: अखिलेश

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कहा कि ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक है. कुछ लोगों द्वारा सत्ता की कठपुतली बनकर लोकतंत्र को धोखा देना, घोर संवैधानिक अपराध है. इससे बड़ा और क्या लोकतंत्रिक अपराध हो सकता है? यह लोकतंत्र को मिटाने के किसी षड्यंत्र से कम नहीं है. सीधा-सीधा षड्यंत्र है लोकतंत्र को खत्म करने का.

AAP नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि SIR एक बहुत बड़ा घोटाला है और उसके ज़रिए जो चुनाव देश भर में कराए जा रहे हैं, उन चुनावों का कोई मतलब बचता नहीं है. ये मोदी की लोकप्रियता का चुनाव नहीं है, ये लूटप्रियता का चुनाव है तो इसलिए ये सारे चुनाव रद्द होने चाहिए और ज्ञानेश कुमार को तत्काल गिरफ्तार करके उनको जेल में डालना चाहिए. ये बहुत बड़ा अपराधी है, इसने देश के चुनावों को लूटने का काम किया है.

वहीं बीजेपी ने भी विपक्ष के हमलों पर जवाब दिया और पूछा है कि जो लोग वोट चोरी का आरोप लगाते हैं वो तमिनाडु जैसे राज्यों के जनादेश पर क्या कहेंगे. बीजेपी ने कुछ पूर्व चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल का भी जिक्र किया.

कैसे काम करता है चुनाव आयोग, उसकी शक्तियां क्या हैं?

भारत में निर्वाचन आयोग स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने वाली एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत इसे चुनावों के कामकाज की व्यवस्था, निर्देशन और नियंत्रण की व्यापक शक्तियां हैं. चुनाव आयोग देश में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए चुनाव आयोजित कराता है.

– चुनाव आयोग एक तीन सदस्यीय संस्था है.
– इसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्त हैं.
– सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले के मुताबिक तीनों की शक्तियां समान हैं.
– और कोई भी फैसला बहुमत से या सर्वसम्मति से ही ले सकते हैं.
– यानी कोई फैसला लेना है तो वो 2-1 के मत से या 3-0 के मत से ही लिया जा सकता है.

मतदाताओं, राजनीतिक दलों या प्रक्रिया में बदलाव को लेकर कोई निर्णय लिया जाता है तो उसे लागू करने के लिए राज्यों के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर को ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है। चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु होता है, इनमें जो भी पहले हो.कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग में कोई बड़ा या छोटा अधिकारी नहीं, सबके पास बराबर अधिकार है.

चुनाव आयोग में असहमति नई बात नहीं है. वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जुड़े ताजा पर्दाफाश ने इस तथ्य को फिर से सामने ला दिया है. अक्टूबर 1993 में दो और चुनाव आयुक्तों एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति की नियुक्ति के साथ आयोग एक सदस्यीय से बहुसदस्यीय हो गया.

टीएन शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. हालांकि उनकी चुनौती नहीं टिक पाई. उस केस में ये सिद्धांत स्पष्ट हुआ कि अगर तीनों सदस्यों की राय अलग हो तो बहुमत का फैसला लागू होगा. यही व्यवस्था आगे चलकर चुनाव आयोग के भीतर होने वाली असहमतियों का आधार बनी.

1995 में गिल ने आरोप लगाया कि टी एन शेषन उन्हें और कृष्णमूर्ति को आयोग के काम में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं कर रहे. एक विवाद में सेशन ने आयोग के काम का एक हिस्सा डिप्टी चुनाव आयुक्त को सौंप दिया, जिस पर गिल और कृष्णमूर्ति ने आपत्ति जताई थी. शेषन पर यहां तक आरोप लगा कि वो आयुक्तों को मीटिंग में नहीं बुलाते.

2009 का भी मामला असाधारण था. जिसमें चीफ इलेक्शन कमिश्नर एन गोपालस्वामी ने अपने सहयोगी और इलेक्शन कमिश्नर नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी. गोपालस्वामी ने चावला पर एक राजनीतिक दल के पक्ष में पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने का आरोप लगाया था. हालांकि ये सिफारिश मंजूर नहीं हुई और आगे चलकर चावला मुख्य चुनाव आयुक्त बन गए थे.

2019 भी चुनाव आयोग के अंदर असहमति के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा. तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से जुड़े आचार संहिता के मामलों में आयोग के बहुमत के फैसलों से अलग राय रखी थी. कई शिकायतों में आयोग के बहुमत ने आचार संहिता का उल्लंघन नहीं माना, जबकि लवासा की राय अलग थी. उन्होंने अपनी असहमति को आयोग के आदेशों में दर्ज किए जाने की मांग की थी. विवाद बढ़ने पर लवासा ने आचार संहिता से जुड़े मामलों की बैठकों से खुद को अलग कर लिया था.

मामला चिंताजनक और आरोप बेहद गंभीर

कुल मिलाकर देखा जाए तो मामला चिंताजनक और आरोप बेहद गंभीर हैं. लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा टूटना नहीं चाहिए. चुनाव आयोग देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव का पहरेदार है. नागरिकों के मताधिकार का रक्षक है. तीन सदस्यीय इस संवैधानिक संस्था से आम तौर पर एक सुर में बोलने की उम्मीद की जाती है.लेकिन क्या चुनाव आयोग के भीतर हमेशा फैसले एकमत से होते हैं? इतिहास और वर्तमान. दोनों के आधार पर फिलहाल तो इसका जवाब नहीं में दिख रहा है.

(टीवी9 भारतवर्ष ब्यूरो)

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पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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