सियासत साइडलाइन, सुर्खियों में ‘साहब’: अखबारों में बदलती तस्वीर पर चर्चा तेज, छत्तीसगढ़ में अब नेताजी नहीं, ‘साहब’ की धाक!

धमतरी: छत्तीसगढ़ के सियासी समंदर में इन दिनों एक अजीबोगरीब ‘सुनामी’ आई है. सत्ता की गलियारों से लेकर प्रदेश के अखबारों के फ्रंट पेज तक, स्क्रिप्ट पूरी तरह बदल गई है. कल तक जो नेताजी फीता काटने और बयानबाजी करने के लिए कैमरों के आगे ‘पोज’ मारते थे, आज वे खबरों के ‘मार्जिन’ में सिमट गए हैं. अब पूरे प्रदेश में एक ही ब्रांड का जलवा है- ‘अफसरशाही का एक्शन अवतार!’

राजधानी से रमनजंग तक: ‘साहब’ हुए सुपरस्टार

रायपुर के मंत्रालय से लेकर बस्तर के सुदूर अंचलों तक, अखबारों की हेडलाइंस पर अब कलेक्टर, एसपी और जिला प्रशासन के अधिकारियों का कब्जा है. पहले जहाँ पन्ने ‘नेताजी के दौरे’ और ‘कार्यकर्ता सम्मेलन’ से भरे होते थे, वहां अब ‘अचानक निरीक्षण’, ‘सस्पेंड’, और ‘बुलडोज़र वाली कार्रवाई’ की खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं. जनता अब नेताओं के प्रेस नोट से ऊब चुकी है; उसे तो वो ‘साहब’ चाहिए जो सीधे मौके पर पहुंचकर ‘ऑन-द-स्पॉट’ फैसला ले.

नेताजी की ‘साइडलाइन’ वाली परेशानी

सत्ता के गलियारों में अब सन्नाटा नहीं, ‘फुसफुसाहट’ है. कई विधायक और मंत्री इस बात से परेशान हैं कि उनका ‘क्रेडिट’ कौन ले जा रहा है? सोशल मीडिया और डिजिटल न्यूज़ के दौर में जिस तेज़ी से अधिकारियों की ‘एक्शन-मोड’ वाली तस्वीरें वायरल हो रही हैं, उसके सामने नेताओं की पारंपरिक रैलियां और उद्घाटन की खबरें ‘बासी’ लगने लगी हैं. नेताजी अब प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भी वो टीआरपी नहीं बटोर पा रहे, जो एक जिले के कलेक्टर के ‘मिडनाइट इंस्पेक्शन’ से मिल रही है.

जनता का मूड: ‘भाषण’ नहीं, ‘राशन’ और ‘रिजल्ट’ चाहिए

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि प्रदेश की जनता अब बदल गई है. उसे आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति नहीं, ‘रिजल्ट-ओरिएंटेड गवर्नेंस’ चाहिए. जब कोई अधिकारी अवैध रेत माफिया को पकड़ता है या गड़बड़ी करने वाली राशन दुकान को सील करता है, तो आम आदमी को उसमें अपनी जीत दिखती है. इसीलिए, मीडिया का कैमरा भी अब नेताओं की गाड़ियों के पीछे नहीं, बल्कि अधिकारियों के ‘रफ-एंड-टफ’ अंदाज के पीछे दौड़ रहा है.

सवाल वही- क्या ये परमानेंट है?

छत्तीसगढ़ में छिड़ी इस ‘पिक्चर’ का क्लाइमेक्स अभी आना बाकी है. क्या नेताजी अपनी खोई हुई स्क्रीन स्पेस वापस पाने के लिए कोई ‘मास्टरस्ट्रोक’ चलेंगे, या फिर ‘साहब’ के इस दबदबे के सामने उन्हें हमेशा के लिए बैकसीट लेनी पड़ेगी? फिलहाल तो प्रदेश भर में ‘साहब’ ही सुर्खियों के ‘सुल्तान’ बने हुए हैं और नेताजी बस अगली हेडलाइन के इंतजार में बैठे हैं!

close