UGC पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बलिया के लिए गौरव की बात, जानिए वज़ह

बलिया: यूजीसी के विरोध में बलिया समेत पूरे देश भर में सवर्ण समाज के द्वारा विरोध किया जा रहा वहीं बलिया के दो लाल, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता नीरज कुमार सिंह और याचिका करता मृत्युंजय तिवारी ने सवर्ण समाज को राहत देने का काम किया है.

UGC के नए विनियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती बलिया के दो लाल ने दिया जी हां काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और शीतल दवनी बंसडीह रोड बलिया के निवासी, पूर्व ब्लॉक प्रमुख स्वर्गीय रामजतन सिंह के पोते नीरज कुमार सिंह ने यूजीसी विनियमन 2026 को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की है.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित नए विनियमों के खिलाफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की है. यह याचिका अधिवक्ता नीरज कुमार सिंह के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दाखिल की गई है. याचिका का शीर्षक मृत्युंजय तिवारी बनाम भारत संघ है, जो वर्ष 2026 की डायरी संख्या 4985/2026 के रूप में पंजीकृत है.
इसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का संवर्धन) विनियम, 2026, विशेष रूप से विनियम 3(ग) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जिसे 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था.
क्या है याचिका का मुख्य मुद्दा-
याचिका में कहा गया है कि विनियम 3(ग) “जाति-आधारित भेदभाव” को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित करता है, जबकि सामान्य/गैर-अनुसूचित वर्ग के छात्रों और नागरिकों को—even यदि वे जाति-आधारित उत्पीड़न का सामना कर रहे हों—किसी भी कानूनी संरक्षण से बाहर कर देता है. छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी का कहना है कि यह प्रावधान पीड़ित का कृत्रिम और असंवैधानिक वर्गीकरण करता है. यह मान लेता है कि जाति-आधारित भेदभाव केवल एक ही दिशा में होता है. और इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव निषेध) एवं 21 (गरिमा और जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करता है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के विरुद्ध याचिका में इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) सहित सुप्रीम कोर्ट के स्थापित निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया है कि जाति और वर्ग समान नहीं हैं. केवल कुछ वर्गों तक ही जाति-आधारित भेदभाव को सीमित करना मनमाना और असंवैधानिक है.
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि JNU, दिल्ली विश्वविद्यालय और अशोका विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में सामान्य वर्ग के छात्रों के विरुद्ध भी जाति-आधारित शत्रुता के उदाहरण सामने आए हैं. लेकिन UGC के नए विनियम ऐसे मामलों में कोई शिकायत-निवारण तंत्र उपलब्ध नहीं कराते. इससे अकादमिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(क)) और मानसिक स्वास्थ्य व गरिमा के अधिकार (अनुच्छेद 21) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.
सुप्रीम कोर्ट से मांग-
छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी, अपने अधिवक्ता नीरज सिंह के माध्यम से, माननीय सर्वोच्च न्यायालय से मांग करते हैं कि
UGC विनियम 3(ग) को, जहाँ तक वह “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा को सीमित करता है. असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया जाए या उक्त प्रावधान में संशोधन का निर्देश दिया जाए, ताकि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध, उसकी जाति की परवाह किए बिना, जाति-आधारित भेदभाव को शामिल किया जा सके और वास्तविक समानता एवं समावेशन सुनिश्चित हो.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता नीरज कुमार सिंह और याचिका करता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि यह बलिया जिले के गौरवशाली इतिहास के लिए गौरव की बात है कि क्रांति की अलख व मिसाल सदैव बागी बलिया से जलता है यह जीत नहीं बल्कि बलिया के गौरव की बात है. आपको बता दे कि यूजीसी लागू करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने अगले सुनवाई तक रोक लगा दिया है जिसे आंशिक रूप से सवर्ण समाज के लिए जीत माना जा रहा है.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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