गुरु की सार्थकता कब? जब शिष्य उनसे आगे निकल जाए, क्यों कहा जाता है ऐसा?

बचपन में सुनी हुई कुछ बातें हमारे साथ बड़ी अजीब तरह से रहती हैं. उस समय उनका अर्थ समझ नहीं आता, लेकिन वे मन के किसी कोने में चुपचाप बैठ जाती हैं. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. बचपन में ट्रेन से कहीं जाते हुए मैंने किसी बुज़ुर्ग को एक वाक्य कहते सुना था. मुझे आज उस ट्रेन का नाम याद नहीं, जगह याद नहीं और वह व्यक्ति कौन था, यह भी याद नहीं. लेकिन वह वाक्य आज तक याद है: ‘गुरु को हराकर, बाप को मारकर, मां को कुछ न देकर, पत्नी को सब कुछ देने वाला बड़ा आदमी होता है.
पहली बार सुनकर मैं चौंक गया था. मुझे लगा, यह कैसी बात है? गुरु को हराना क्यों? बाप को मारना क्यों? मां को कुछ नहीं देना क्यों? और पत्नी को सब कुछ क्यों देना? उस समय मुझे कुछ समझ नहीं आया. फिर उसी व्यक्ति ने मुझे इसका अर्थ समझाया. वर्षों बाद, जब जीवन को थोड़ा समझने लगा, तब लगा कि उस वाक्य में हिंसा नहीं थी. उसमें जीवन के चार बड़े पाठ छिपे थे.
गुरु की सबसे बड़ी जीत
‘गुरु को हराकर. मुझे अर्जुन का उदाहरण बताया गया. अर्जुन अपने गुरु द्रोण के प्रिय शिष्यों में था. उसने गुरु से जितना सीख सकता था, सीखा. लेकिन सीखना वहीं खत्म नहीं हुआ. उसने अभ्यास किया, और सीखा, दूसरे लोगों से भी ज्ञान लिया, अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाया. उस पुरानी व्याख्या में कहा गया था कि एक दिन शिष्य को अपने गुरु से आगे निकलना चाहिए. यही गुरु की सबसे बड़ी जीत है.
गुरु को ‘हराना’ गुरु का अपमान नहीं
अगर गुरु ने आपको सिखाया और आप सारी जिंदगी उसी जगह खड़े रहे, तो आपने गुरु की बात याद तो रखी, लेकिन शायद उसकी असली भावना नहीं समझी. एक सच्चा गुरु ऐसा शिष्य नहीं चाहता जो हमेशा उसके पीछे चलता रहे. वह चाहता है कि शिष्य एक दिन उससे आगे जाए, ऐसी जगह पहुंचे जहां गुरु खुद शायद कभी नहीं पहुंच पाया. इसलिए गुरु को ‘हराना’ गुरु का अपमान नहीं है. यह उस ज्ञान का सम्मान है जो उसने आपको दिया.
हर परिवार और हर पीढ़ी की कहानी
बचपन में यह बात मुझे सिर्फ अर्जुन की कहानी लगी थी. आज लगता है, यह हर परिवार और हर पीढ़ी की कहानी है. एक पिता अपने बच्चे को चलना सिखाता है. पहले बच्चा उसका हाथ पकड़कर चलता है. फिर एक दिन वही बच्चा हाथ छोड़कर दौड़ता है. पिता पीछे रह जाता है, बच्चा आगे निकल जाता है. क्या उस दिन पिता हार गया? नहीं. शायद उसी दिन उसकी सबसे बड़ी जीत हुई.
पिता के दिए हुए जीवन की सफलता
बच्चे का अपने पिता से आगे निकलना पिता की हार नहीं, पिता के दिए हुए जीवन की सफलता है. इसलिए ‘बाप को मारकर’ का अर्थ भी किसी हिंसा से नहीं था. बच्चा अपने पिता के नाम से पहचाना जाता है. फिर एक दिन ऐसा आता है जब लोग पिता को बेटे के नाम से पहचानने लगते हैं. उस दिन बेटे ने पिता को मिटाया नहीं. उसने पिता की छाया से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाई. हर पीढ़ी को एक दिन यही करना पड़ता है. जड़ें पीछे रहती हैं, पेड़ आगे बढ़ता है.
मां का बच्चे पर हिसाब
फिर आती है वह पंक्ति जिसने मुझे सबसे ज्यादा उलझाया था: ‘मां को कुछ न देखकर. उस समय मुझे इसका अर्थ बताया गया कि मां का बच्चे पर कोई हिसाब नहीं होता. बच्चा मां से है, मां बच्चे से नहीं. मां बच्चे को जन्म देती है, उसे पालती है, उसके लिए जागती है, उसके रोने पर उठती है, उसके गिरने पर दौड़ती है. बच्चा जब छोटा होता है तो वह यह भी नहीं जानता कि मां उसके लिए कितना कुछ कर रही है.
मां कभी यह नहीं कहती कि पहले मेरी सेवा करो, फिर मैं तुम्हें प्यार दूंगी. उसका देना किसी लेन-देन का हिस्सा नहीं है. इसलिए मां को देने के लिए कोई हिसाब बनाना ही गलत है. शायद मां के प्रति सबसे बड़ी कृतज्ञता यही है कि उसके दिए हुए जीवन को अच्छा बनाया जाए. मां को लौटाने के लिए कोई रकम, कोई उपहार या कोई उपलब्धि पर्याप्त नहीं हो सकती.
पत्नी को सबसे पहले अपनापन देना चाहिए
और फिर आती है पत्नी. ‘पत्नी को सब कुछ देने वाला. बचपन में सुनी उस बात का अर्थ मुझे तब यह बताया गया था कि पत्नी अपना घर छोड़कर दूसरे घर में आती है. वह अपने पीछे अपना बचपन, अपना परिवार, अपनी आदतें, अपनी परिचित दुनिया छोड़ आती है. नए घर में उसके पास शुरुआत में शायद केवल उसका अपना विश्वास होता है. इसलिए पति को उसे केवल घर, पैसा या सुविधाएं नहीं देनी चाहिए. उसे सबसे पहले अपनापन देना चाहिए.
उसे यह महसूस होना चाहिए कि वह किसी दूसरे के घर में आई हुई मेहमान नहीं है. वह अब इस घर की अपनी है. उसके विचार की जगह है, उसके सपनों की जगह है, उसकी असहमति की जगह है और उसकी गरिमा की जगह है. ‘सब कुछ’ शायद वस्तुओं का नाम नहीं है. ‘सब कुछ’ का अर्थ है, उसे कभी यह महसूस न होने देना कि वह अकेली है.
मनुष्य के बनने की चार अवस्थाओं की कहानी
आज जब मैं उस पुराने वाक्य को याद करता हूं, तो मुझे लगता है कि वह चार रिश्तों की नहीं, मनुष्य के बनने की चार अवस्थाओं की कहानी थी. गुरु हमें ज्ञान देता है, लेकिन हमें उससे आगे जाना है. पिता हमें पहचान और आधार देता है, लेकिन हमें अपनी पहचान बनानी है. मां हमें बिना शर्त देती है, इसलिए उसके प्रेम को हिसाब में नहीं बदलना है. और पत्नी हमारे जीवन में अपना पूरा संसार लेकर आती है, इसलिए उसे जीवन में पूरा स्थान देना है.
शायद बड़ा आदमी वह नहीं जो सबसे ऊंची जगह पर बैठता है. बड़ा वह है जो जिन लोगों से उसे जीवन मिला, उनके दिए हुए को अपने भीतर बढ़ाता है और फिर आगे बांटता है. गुरु से आगे निकलता है, पिता से आगे बढ़ता है, मां के ऋण को समझता है और अपने साथ चलने वाले इंसान को कभी अकेला महसूस नहीं होने देता.
तो अगर आज आपके गुरु, आपके माता-पिता और आपके जीवनसाथी चुपचाप आपके सामने खड़े होकर आपसे सिर्फ एक सवाल पूछें, तो क्या आप उनके सामने यह कह पाएंगे कि आपने उनसे मिली जिंदगी को उनसे बेहतर बनाने की कोशिश की है?











