कथक की थाप और बंदिशों से सजी शाम, मऊमाला नायक की प्रस्तुति ने मोहा मन; ‘चंद्रबदनी’ पर यास्मीन सिंह ने बिखेरा रंग

रायगढ़ में 41वें चक्रधर समारोह की तीसरी सांस्कृतिक संध्या सुर, ताल और लय के खूबसूरत संगम से सजी। देश और प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे कलाकारों ने नृत्य और संगीत की कई विधाओं की प्रस्तुतियां दीं।
दिल्ली की कथक नृत्यांगना मऊमाला नायक ने अपने दल के साथ शानदार कथक प्रस्तुति दी। भगवान श्रीगणेश की वंदना से शुरुआत के बाद तुलसीदास और रत्नावली की कथा को भाव-अभिनय के जरिए प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद राग मालगुंजी और तीनताल पर आधारित चतुरंग की प्रस्तुति हुई, जिसमें सरगम, नृत्य, तराना और वाद्य के बोल का सुंदर मेल देखने को मिला। धमार ताल में पारंपरिक कथक बंदिशों और सधी हुई लयकारी ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।
वहीं, डॉ. यास्मीन सिंह ने भगवान श्रीकृष्ण की वंदना, ‘गोविंदा गोपाला’, ‘झूला गीत’ और ‘द्रौपदी’ की कथक प्रस्तुतियां दीं। कार्यक्रम का खास आकर्षण महाराजा चक्रधर सिंह की रचना ‘चंद्रबदनी’ रही, जिसे कथक की भाव-भंगिमाओं के जरिए मंच पर जीवंत किया गया।
कार्यक्रम में गरियाबंद के वरिष्ठ रंगकर्मी भूपेन्द्र साहू ने छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के रंग भी बिखेरे। उनकी प्रस्तुति में राज्य गीत ‘अरपा पैरी के धार’, भोजली, सुवा, पंथी, कर्मा और ददरिया जैसे लोकगीत और लोकनृत्य शामिल रहे।
नारी शक्ति से लेकर छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं और भक्ति तक, तीसरी सांस्कृतिक संध्या ने दर्शकों को प्रदेश की समृद्ध कला और संस्कृति के कई रंगों से रूबरू कराया।











