बांग्लादेश की हिंसा पर सवाल, भारत में मॉब लिंचिंग पर चुप्पी क्यों? मौलाना मदनी का सरकार से दोहरे रवैये पर हमला

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने बांग्लादेश में हुई हिंसक घटना की कड़ी निंदा करते हुए भारत में बढ़ती मॉब लिंचिंग और सांप्रदायिक घटनाओं पर सरकार की चुप्पी को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की घटनाओं पर चर्चा होती है, लेकिन देश के भीतर दलितों और अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों पर चुप्पी एक दोहरे रवैये को दर्शाती है।
मौलाना मदनी ने सोशल मीडिया के जरिए कहा कि बांग्लादेश में जो हुआ, वह केवल हत्या नहीं बल्कि अमानवीयता की चरम सीमा है और इसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम ऐसी किसी भी हिंसा की इजाजत नहीं देता और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। उनके मुताबिक इस तरह की घटनाएं न सिर्फ मानवता के खिलाफ हैं, बल्कि धर्म को भी बदनाम करती हैं।
उन्होंने देश में बढ़ते धार्मिक उग्रवाद और नफरत पर चिंता जताते हुए कहा कि यह माहौल भारत को भी नुकसान पहुंचा रहा है। क्रिसमस के दौरान ईसाई समुदाय के साथ हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता पर हमले किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हैं। चर्चों पर हमले और त्योहार मनाने से रोकने की कोशिशें संविधान के मूल्यों के खिलाफ हैं।
मौलाना मदनी ने हाल के दिनों में सामने आई कई घटनाओं का उल्लेख किया, जिनमें बिहार, केरल और ओडिशा में मॉब लिंचिंग के मामले शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं पर न तो सरकार की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया आई और न ही मंत्रिमंडल के किसी सदस्य ने सार्वजनिक रूप से निंदा की। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो उन पर चुप्पी क्यों साध ली जाती है।
अपने बयान के अंत में उन्होंने कहा कि यह वह भारत नहीं है, जिसका सपना महात्मा गांधी, मौलाना आज़ाद और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था।
वहीं, मौलाना मदनी के बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने उनके आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया और कहा कि ऐसे बयान केवल राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए दिए जा रहे हैं। इसके साथ ही यह तर्क भी दिया गया कि अलग-अलग राज्यों में होने वाली हिंसक घटनाओं पर चयनात्मक सवाल उठाए जाते हैं।









