14 घंटे की मेहनत, आमदनी सिर्फ 700 रुपये, मजबूरी में हड़ताल छोड़कर काम पर लौटे डिलीवरी कर्मी

नए साल से पहले गिग वर्कर्स की हड़ताल ने देशभर में सुर्खियां बटोरीं, लेकिन आर्थिक मजबूरियों ने कई डिलीवरी कर्मियों को फिर से काम पर लौटने के लिए मजबूर कर दिया। डिलीवरी एजेंटों का कहना है कि वे लंबे समय तक हड़ताल में नहीं रह सकते, क्योंकि रोजमर्रा के खर्च और परिवार की जिम्मेदारियां उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हैं।

डिलीवरी कर्मियों के अनुसार, 12 से 14 घंटे तक काम करने के बाद भी उन्हें औसतन 600 से 700 रुपये ही मिल पाते हैं। इसके बावजूद वे हड़ताल जारी नहीं रख सके, क्योंकि काम बंद होते ही आमदनी पूरी तरह रुक जाती है। कई कर्मियों ने बताया कि किराया, बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलाने के लिए उन्हें मजबूरी में दोबारा ड्यूटी जॉइन करनी पड़ी।

गिग वर्कर्स यूनियन की ओर से बेहतर भुगतान, बीमा, ईंधन भत्ता और स्थायी काम के घंटे तय करने की मांग को लेकर हड़ताल का आह्वान किया गया था। बड़ी संख्या में डिलीवरी पार्टनर्स ने इसमें हिस्सा लिया, लेकिन समय बीतने के साथ कई लोग आर्थिक दबाव के कारण पीछे हटने लगे।

डिलीवरी एजेंटों का कहना है कि त्योहार और नए साल के दौरान ऑर्डर ज्यादा होते हैं, लेकिन मेहनत के मुकाबले कम भुगतान मिलने से वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। उनका आरोप है कि इंसेंटिव और बोनस के नियम बार-बार बदल दिए जाते हैं, जिससे कमाई का भरोसा नहीं रहता।

हड़ताल कमजोर पड़ने के बावजूद गिग वर्कर्स का कहना है कि उनकी समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं। वे उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले समय में कंपनियां उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करेंगी और काम की शर्तों में सुधार होगा, ताकि मेहनत के बदले उन्हें सम्मानजनक आय मिल सके।

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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