रुहेरी-रहना रोड पर रोज जाम और झगड़े, कभी भी भड़क सकता है बड़ा बवाल

हाथरस: रुहेरी से रहना के रास्ते का अतिक्रमण फैक्ट्री संचालकों व वाहन चालकों के लिए बना नासूर, अतिक्रमण कहीं बन न जाए किसी दिन बड़े बवाल का कारण
रुहेरी से रहना जाने वाला मार्ग आज सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि अतिक्रमण की वजह से उद्योगों की रफ्तार पर लगाया गया ब्रेक बन चुका है.
इसी रहना रोड पर बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज स्थापित हैं, जो देश और विदेश के लिए इंपोर्ट–एक्सपोर्ट का माल तैयार करती हैं। इन फैक्ट्रियों तक पहुंचने और आसपास के कई गांवों को जोड़ने का एकमात्र रास्ता यही सड़क है.कागजों में यह रोड 8 मीटर यानी लगभग 24 फीट चौड़ी दर्ज है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अतिक्रमण के चलते यह सड़क सिमटकर महज 3 मीटर यानी करीब 9 फीट की रह गई है.
अतिक्रमण के चलते लगा जाम

सड़क के दोनों ओर स्थानीय लोगों ने पक्के निर्माण कर खुलेआम अतिक्रमण कर लिया है.हैरानी की बात यह है कि घरों के सामने लगे विद्युत पोलों को भी इन लोगों ने अपने अतिक्रमण वाले निर्माण में शामिल कर लिया है और पोल के चारों ओर पक्के चबूतरे बना दिए गए हैं.
रास्ता सकरा होने के कारण यहां अक्सर जाम की स्थिति बनी रहती है.जैसे ही किसी फैक्ट्री के लिए बड़ा लोडर वाहन आता है, पूरी सड़क ठप हो जाती है.
पक्के निर्माण कर किया गया अतिक्रमण

हाईवे के रुहेरी तिराहे से फैक्ट्री तक की मात्र 1500 मीटर की दूरी तय करने में लोडर वाहनों को एक से डेढ़ घंटा तक लग जाता है.इस दौरान वाहन चालकों को स्थानीय लोगों से तू-तू मैं-मैं, बहस और भारी मशक्कत का सामना करना पड़ता है.अतिक्रमण के बावजूद लोग अपने घरों के सामने दोपहिया वाहन, हाथ ठेले और अन्य सामान भी खड़ा कर लेते हैं, जिससे रास्ता और अधिक संकीर्ण हो जाता है.
हालात ऐसे हो गए हैं कि अब लोडर वाहन इन फैक्ट्रियों में आने से कतराने लगे हैं, जिसका सीधा असर फैक्ट्री के प्रोडक्शन और सप्लाई पर पड़ रहा है.
अतिक्रमण का असर बिजली व्यवस्था पर भी साफ नजर आता है। विद्युत लाइन में फॉल्ट होने पर जब बिजली कर्मी मौके पर पहुंचते हैं तो अतिक्रमणकारियों द्वारा उन्हें पोलों पर चढ़ने तक नहीं दिया जाता, जबकि पोलों के चारों ओर पहले से ही पक्के चबूतरे बने हुए हैं.कई बार विद्युत कर्मियों के साथ अभद्रता और झगड़े की स्थिति भी पैदा हो जाती है.इस अतिक्रमण की वजह से लगने वाले जाम को लेकर क्षेत्र में कई बार बड़ा हंगामा हो चुका है, जिसमें पुलिस को मौके पर पहुंचकर हस्तक्षेप करना पड़ा.
फैक्ट्री मालिकों का दर्द यह है कि वे अपने उद्योग का काम संभालें या फिर रोजाना अपने लोडिंग वाहनों को निकलवाने के लिए अतिक्रमणकारियों से उलझते रहें.
अब सवाल यह है कि आखिर प्रशासन कब तक इस गंभीर समस्या से आंखें मूंदे रहेगा और कब इस अतिक्रमण पर सख्त कार्रवाई कर उद्योगों और आम जनता को राहत दिलाई जाएगी.











