बिहार के अस्पताल में ‘जुगाड़’ से इलाज! प्लास्टर नहीं… गत्ते के सहारे बांधा टूटा पैर

बिहार की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बेहद हैरान करने वाली तस्वीर पूर्वी चंपारण जिले से सामने आई है. सरकार भले ही सूबे में विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है. ताजा मामला सुगौली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) का है, जहां डॉक्टरों को एक गंभीर मरीज के टूटे पैर को सीधा रखने के लिए मेडिकल स्प्लिंट की जगह कार्डबोर्ड (गत्ते) के टुकड़े का सहारा लेना पड़ा.
भीषण हादसे के बाद अस्पताल पहुंचे थे घायल
दरअसल, सुगौली थाना क्षेत्र में एक टेंपो और पिकअप वैन के बीच आमने-सामने की जोरदार टक्कर हो गई. इस भीषण सड़क हादसे में चार लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई, जबकि चार अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए. सभी घायलों को आनन-फानन में इलाज के लिए सुगौली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया.
घायलों में से दो मरीजों के पैर की हड्डी बुरी तरह टूट चुकी थी. आरोप है कि अस्पताल में फ्रैक्चर को स्थिर रखने (इममोबिलाइज करने) के लिए जरूरी ऑर्थोपेडिक सामग्री या स्प्लिंट उपलब्ध नहीं था. मरीज दर्द से तड़प रहे थे, जिसके बाद डॉक्टरों ने अपनी मजबूरी या सूझबूझ के तहत वहां पड़े एक बेकार कार्डबोर्ड के डिब्बे को काटकर मरीज के पैर में बांध दिया, ताकि हड्डी आगे-पीछे न हिले.
मामले को लेकर अस्पताल के डॉक्टर रिजवी का कहना है कि गंभीर रूप से घायल मरीज की स्थिति को देखते हुए उसकी टूटी हड्डी को तुरंत स्थिर करना बेहद जरूरी था. अस्पताल में तत्काल आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं होने के कारण प्राथमिक उपचार के तौर पर इस अस्थायी व्यवस्था का सहारा लिया गया, ताकि मरीज को रेफर करते समय उसकी स्थिति और न बिगड़े.
उठ रहे हैं कई गंभीर सवाल
इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद इलाके में स्वास्थ्य विभाग की भारी किरकिरी हो रही है. अब लोग सरकार और प्रशासन से सवाल पूछ रहे हैं कि क्या बिहार के सरकारी अस्पतालों में प्राथमिक उपचार के लिए जरूरी स्प्लिंट और अन्य बुनियादी चिकित्सा सामग्री भी उपलब्ध नहीं है? करोड़ों रुपये के बजट वाले स्वास्थ्य विभाग के अस्पताल क्या हमेशा ‘जुगाड़’ के भरोसे ही चलते रहेंगे? इस गंभीर लापरवाही और आपातकालीन उपकरणों की कमी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?











