बनास BIO-CNG मॉडल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार, ग्रीन एनर्जी को मिलेगा बढ़ावा

गुजरात में विकसित बनास BIO-CNG मॉडल अब स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण समृद्धि का एक सफल उदाहरण बनकर उभर रहा है। इस परियोजना के जरिए गोबर जैसे अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलकर न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि हो रही है। यह मॉडल हर साल हजारों टन कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सक्षम बताया जा रहा है।
राज्य सरकार ने इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए विशेष बजटीय प्रावधान किया है। सहकारी दुग्ध संघों द्वारा नए प्लांट स्थापित करने के लिए आर्थिक सहायता दी जा रही है, जिससे आने वाले समय में कई नए संयंत्र स्थापित किए जाने की योजना है। इसका उद्देश्य डेयरी सेक्टर को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन से जोड़ना और ग्रामीण क्षेत्रों को आत्मनिर्भर बनाना है।
बनासकांठा में स्थापित संयंत्र पिछले कई वर्षों से सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है। इस मॉडल से प्रेरित होकर अन्य स्थानों पर भी बड़े स्तर पर प्लांट लगाने का काम जारी है। इन संयंत्रों में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में गोबर का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण किया जाता है, जिससे बायो-सीएनजी और जैविक खाद का उत्पादन होता है।
इस पहल से आसपास के गांवों के पशुपालक परिवारों को सीधा लाभ मिल रहा है। किसान गोबर की आपूर्ति कर अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। साथ ही, गोबर के संग्रहण और परिवहन से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं।
उत्पादन के स्तर पर यह मॉडल बहुउपयोगी साबित हो रहा है। बायो-सीएनजी के साथ-साथ ठोस और तरल जैविक उर्वरक भी तैयार किए जा रहे हैं, जिससे संयंत्र को अच्छा राजस्व मिल रहा है। यह पूरी व्यवस्था पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और कृषि—तीनों क्षेत्रों के लिए फायदेमंद मानी जा रही है।
यह परियोजना जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। स्वच्छ ईंधन के उत्पादन और अपशिष्ट प्रबंधन के इस मॉडल से पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिल रही है और हरित विकास की दिशा में राज्य को मजबूती मिल रही है।









