15 साल की उम्र में घर छोड़ा, 555 गांवों तक पहुंचकर बदली हजारों बेटियों की जिंदगी

दंतेवाड़ा के छोटे से गांव हीरानार से निकलकर पद्मश्री सम्मान तक पहुंचीं डॉ. बुधरी ताती का जीवन संघर्ष, सेवा और सामाजिक परिवर्तन की मिसाल बन गया है। महज 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़कर समाज सेवा का रास्ता चुना और बस्तर के दूर-दराज के इलाकों में शिक्षा व महिला सशक्तिकरण का अभियान शुरू किया।
डॉ. बुधरी ताती ने बताया कि उस समय आदिवासी समाज की महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी आसान नहीं था। वनवासी कल्याण आश्रम से प्रेरणा मिलने के बाद उन्होंने समाज के लिए काम करने का संकल्प लिया और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटीं।
उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में न सड़कें थीं, न परिवहन की सुविधा। कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था, कई बार भूखे पेट रात गुजारनी पड़ी और लोगों का अविश्वास भी झेलना पड़ा। कई मौकों पर जान से मारने की धमकियां भी मिलीं, लेकिन समाज सेवा का संकल्प कमजोर नहीं पड़ा।
डॉ. ताती ने बस्तर के 555 गांवों का दौरा कर महिलाओं और बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगाई। उन्होंने पहले स्वयं दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर हजारों महिलाओं को साक्षर बनाया। साथ ही महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई, स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता का प्रशिक्षण देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा कि कठिनाइयों के बावजूद कभी समाज सेवा छोड़ने का विचार नहीं आया। उनका मानना है कि यदि लक्ष्य बड़ा हो तो चुनौतियां छोटी लगने लगती हैं। आज जब उनके प्रयासों से पढ़े-लिखे बच्चे और आत्मनिर्भर महिलाएं बेहतर जीवन जी रही हैं, तो उन्हें अपने संघर्ष की सफलता का एहसास होता है।
इधर, वनवासी विकास समिति की ओर से आयोजित सम्मान समारोह में पद्मश्री सम्मानित डॉ. बुधरी ताती, डॉ. राम गोडबोले और सुनीता गोडबोले का अभिनंदन किया गया। तीनों को जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा के क्षेत्र में उनके लंबे और उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया।











