AI के दुरुपयोग से महिलाओं की डिजिटल सुरक्षा पर खतरा, सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सतर्क

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दुरुपयोग अब केवल तकनीकी चुनौती नहीं रहा, बल्कि यह महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। डीपफेक और एआई से तैयार किए गए अश्लील कंटेंट के बढ़ते मामलों ने सरकार, महिला आयोग और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में इसे मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में देखा जाने लगा है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एआई टूल्स के जरिए महिलाओं की फर्जी और आपत्तिजनक तस्वीरें व वीडियो बनाए जाने के मामले सामने आए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई के गलत इस्तेमाल से साइबर स्टॉकिंग, फर्जी प्रोफाइल, बिना अनुमति फोटो-वीडियो साझा करने और डीपफेक जैसे अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। यह समस्या अब केवल ऑनलाइन उत्पीड़न तक सीमित नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा पर सीधा हमला बन चुकी है।
भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग ने महिलाओं की डिजिटल सुरक्षा को लेकर सख्त कानूनों की जरूरत पर जोर दिया है। आयोग का कहना है कि मौजूदा साइबर कानून डीपफेक और एआई-जनरेटेड कंटेंट से निपटने में पर्याप्त नहीं हैं, जिससे पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है। आयोग ने एआई से बने फर्जी कंटेंट को स्पष्ट अपराध घोषित करने और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
सरकार ने भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। आईटी मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी कर एआई टूल्स के दुरुपयोग पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। मंत्रालय ने आपत्तिजनक कंटेंट हटाने, नियमों का उल्लंघन करने वाले अकाउंट्स पर कार्रवाई करने और भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने को कहा है।
डीपफेक से जुड़े मामलों में तेजी से बढ़ोतरी ने खतरे को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बड़ी संख्या में लोग डीपफेक कंटेंट का सामना कर चुके हैं और कई लोग इसके शिकार भी बने हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि निचली अदालतों और साइबर सेल को मजबूत किए बिना इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है।











