खदान के अंदर तस्करी, बाहर आंदोलन—सूरजपुर में दो मोर्चों पर संग्राम!

सूरजपुर : जिले के जगन्नाथपुर क्षेत्र स्थित खदान परिसर में सामने आई कोयला तस्करी की घटना और बलरामपुर भूमिगत खदान को पुनः चालू कराने को लेकर चल रहा श्रमिक आंदोलन—दोनों घटनाओं ने एक साथ खनन व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
एक ओर जहां खदान के भीतर अवैध कोयला तस्करी के आरोपों से हड़कंप मचा हुआ है, वहीं दूसरी ओर खदान बंद होने से प्रभावित श्रमिक अपने हक की लड़ाई सड़कों पर उतरकर लड़ने को मजबूर हैं.
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, 15 जनवरी की रात को कोयला चोरी की शिकायत पर की गई.
कार्रवाई के दौरान जगन्नाथपुर खदान परिसर के भीतर तीन संदिग्ध वाहन खड़े पाए गए. इनमें ट्रक क्रमांक CG10 BT 5551, CG10 BS 2153 और BR-24 GC-8640 शामिल हैं.बताया जा रहा है कि ये वाहन बिना किसी वैध अनुमति और दस्तावेज के खदान के भीतर प्रवेश कर चुके थे.जांच के दौरान दस्तावेज मांगे जाने पर चालक और क्लीनर वाहन छोड़कर फरार हो गए, जिससे संगठित कोयला तस्करी की आशंका और गहरा गई है.
घटना के कई दिन बीत जाने के बावजूद यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि बूम बैरियर, काटाघर, सीसीटीवी और सुरक्षा विभाग की कड़ी निगरानी के बीच ये वाहन खदान के भीतर कैसे पहुंचे.इससे बूम बैरियर कर्मियों, काटाघर कर्मचारियों और सुरक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं.जानकारों का कहना है कि बिना अंदरूनी मिलीभगत के इस तरह की तस्करी संभव नहीं है.
वहीं क्षेत्र के महाप्रबंधक की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं, जिन पर या तो लापरवाही या फिर संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं.इसी दौरान खदान से जुड़े एक और अहम मुद्दे पर एचएमएस यूनियन का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है.बलरामपुर भूमिगत खदान को पुनः चालू करने की मांग को लेकर यूनियन द्वारा पांचवें दिन भी क्रमिक भूख हड़ताल जारी रही.
बड़ी संख्या में श्रमिक नेता और कार्यकर्ता आंदोलन में शामिल होकर प्रबंधन और प्रशासन पर दबाव बना रहे हैं. एचएमएस यूनियन बिश्रामपुर क्षेत्र के क्षेत्रीय महामंत्री देवेंद्र मिश्रा ने साफ शब्दों में कहा कि यह आंदोलन किसी भी हालत में कमजोर नहीं पड़ेगा.उन्होंने कहा कि श्रमिकों का हक लड़कर लिया जाएगा और खदान को हर हाल में खुलवाया जाएगा.
उन्होंने यह भी ऐलान किया कि 27 जनवरी तक क्रमिक भूख हड़ताल जारी रहेगी, और यदि मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को आमरण अनशन में बदला जाएगा. एक ओर खदान के भीतर करोड़ों रुपये की कोयला तस्करी के आरोप और दूसरी ओर खदान बंद होने से परेशान श्रमिकों का संघर्ष—इन दोनों घटनाओं ने खनन क्षेत्र में प्रशासनिक व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र और प्रबंधन की नीतियों को कठघरे में खड़ा कर दिया है.
अब सबकी निगाहें प्रशासन, पुलिस और खनन मुख्यालय पर टिकी हैं कि वे तस्करी पर सख्त कार्रवाई कर व्यवस्था सुधारते हैं या फिर श्रमिकों की जायज मांगों को लेकर कोई ठोस और स्थायी समाधान निकालते हैं.











